हिंदी के श्राद्ध दिवस नही.... संकल्प दिवस के रूप में मनाएं.... 

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हिंदी एक भाषा... देवनागरी जिसका मूल नाम है.... भारत की सर्वाधिक प्रयोग की जाने वाली भाषा... विश्व के अन्य देशों में भी बोली जाती है...। इसका अपना शब्द कोष समृद्धशाली है....। फिर भी उपेक्षा ने हिंदी भाषा का आखेट कर लिया.....। इसकी वर्णमाला पर ध्यान दें तो... सभी स्वराक्षर कंठ से ही उच्चारित होते हैं....। बाकी व्यंजनाक्षर भी जिव्हा के मुख के अलग अलग भागों के संपर्क में आने से उच्चारित होंगे...। उदाहरणार्थ कंठ से "क" वर्ग, जिव्हा और तालु के संपर्क से "च" वर्ग, इसी प्रकार अन्य व्यंजनाक्षर का उच्चारण यह सिद्ध करता है कि इनका उदगम ही इनका वर्ग निर्धारित करता है... उसके लिए तालव्य, दंतव्य, ओष्ठव्य आदि संज्ञा दी गई हैं....। 
अब दूसरा भाग.... हिंदी यानि देवनागरी को ही यह गौरव प्राप्त है कि.... यह ध्वनि लिपि भी है... अर्थात जैसा कहा जाएगा या बोला जाएगा... वैसा ही लिखा जाएगा...। यानि.... "क" का उच्चारण हो तो "क" ही लिखा जाता है.... उसको अंग्रेजी का "के" (K) कहकर "क" नहीं माना जाता... अथवा उर्दू में काफ् कहकर "क" नहीं माना जाता...। इसी को आगे बढ़ाएं तो... अक्षर या शब्द के अतिरिक्त जो भी ध्वनि सुनी जा रही है... देवनागरी में उसको वैसा का वैसा ही लिखा जा सकने की क्षमता भी है...। जैसे कागज फाड़ने की जो चर्र... की ध्वनि होगी, या हवा की सरसराहट को लिखना हो, या फिर वाहनों के सड़क से रगड़ खा कर अचानक रुक जाने की ध्वनि हो... सबको यथानुसार लिपि बद्ध करने की क्षमता... देवनागरी में है। 
देश के सर्वाधिक लोकप्रिय कवि कुमार विश्वास ने कहा है कि..... हिंदी वर्णमाला "अ" अज्ञानी से आरम्भ होती है और... " ज्ञ" से ज्ञानी तक की यात्रा कराती है। इतनी समृद्धशाली भाषा का अपने ही घर आंगन में उपेक्षित हो जाना.... क्या आश्चर्य का विषय नहीं है...। विद्यालयों में तो हिंदी माधयम की ही पढाई होती थी....आज भी कुछ संस्थान हिंदी माध्यम से ही पढ़ाई करवा रहे हैं....। लेकिन एक समय था जब देश के नागरिक अपनी हिंदी को सुधारने के लिए.... समाचार पत्रों का अध्ययन न केवल स्वयं करते थे... वरन नई पीढी को भी.... कहा करते थे... हिंदी सुधारना है तो समाचार पत्र का उच्च स्वर में वाचन करो.....। समय ने करवट ली तो यही हिंदी के समाचार पत्र..... अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग समाचारों में करने लगे.... अब तो और आगे बढ़ गए हैं.... समाचार के शीर्षक में अंग्रेजी शब्द ही प्रयोग नहीं हो रहे.... वरन उन शब्दों को अंग्रेजी लिपि में लिखे जाने की परम्परा भी चल पड़ी है....। यहीं से हिंदी के हिंग्लिश बन जाने की यात्रा आरंभ होती है...। इस बाबत जब समाचार संकलन करने वाले... प्रतिनिधि से लेकर संपादक स्तर के.... उत्तरदायी से पूछा गया तो... उनका उत्तर था लोग जिस भाषा को समझते हैं... उसी भाषा का प्रयोग करना हमारी मजबूरी हो जाती है....। जब उनसे यह पूछा गया कि... अस्सी के दशक में जब रामायण, महाभारत, चाणक्य आदि विशुद्ध हिंदी के धारावाहिक का प्रसारण हुआ (अभी वर्तमान में पुनः प्रसारण का उल्लेख भी मान लिया जाए) ..... तब किसी को भी विशुद्ध संस्कृतमय हिंदी भाषा के संवाद... समझने में कोई परेशानी नहीं हुई.....। हाँ नई पीढी ने अवश्य माते, पुत्र, वत्स जैसे अनेक शब्दों से स्वयं को परिचित करा लिया.....। इसी प्रकार टीवी चैनल की हिंग्लिश ने भी हिंदी को.... उपेक्षित करने में अपनी भूमिका का निर्वाह किया है....। प्रसारण, प्रकाशन मे प्रयोग की जाने वाली भाषा ही स्वतः संप्रेषण की भाषा के रूप में अपना ली जाती है.... कदाचित् हिंदी की दुर्गति में संचार माध्यम की बड़ी भूमिका रही है.... इसके अलावा अन्य कारण भी रहे हैं... लेकिन जब आपसी बातचीत में भी.... हिन्दी अपना स्थान खोती.... जा रही है.... तब हिंदी दिवस.... हिंदी का श्राद्ध दिवस ही अधिक प्रतीत होता है......। हालांकि.... इंटरनेट पर अब हिंदी का प्रचलन बढ़ाने का उत्तरदायित्व..   कुछ संस्थान उठा रहे हैं... तभी ये संभव हो पाया है कि.... हिंदी को यूनिकोड जैसा फॉण्ट मिल पाया है.... जो विश्व भर में.... किसी भी मोबाइल या कंप्युटर पर... आसानी से देखा जा सकता है....। .... आज तो हिंदी दिवस की शुभकामनाओं सहित... केवल यही अपेक्षा.... अपनी भाषा पर गर्व करने... के अवसर खोजे न जाएं..... वरन पैदा किये जाएं.... और उत्सव मनाते रहे....। 

शैलेश तिवारी

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