लेखक
मानता तिरिया जन्म अभिशाप ।
लड़के हुए आकाश कुसुम,
लड़की पांव की धूल।
सदियों के बीमार मानसिकता
अपशकुन तिरिया जन्म।
बहू की सुनहरी घुंघट
दास्तां की स्पष्ट अभिव्यक्ति, बंधुआ मजदूर को चरितार्थ करती
चल रही निरंतर डगर।
अपने ही खून थोपते
औरताना स्वभाव।
फिर स्वयं में आरोपित करने को विवश
औसत नारी परजीविता का अभिशाप ढोती
आश्रय के परिवर्तन से भिज्ञ
पर स्वीकारने की घुटन
बना आभूषण, किया शोषण!
तिरिया तिरिया को दमित करती
यह भी आश्रय की कुटिल चाल।
वर्जनाओं एवं निषेधों की डगर नपुंसक समझौता का भार लिए।
समाज और नारी
समाज लकवा ग्रस्त,मानता तिरिया जन्म अभिशाप ।
लड़के हुए आकाश कुसुम,
लड़की पांव की धूल।
सदियों के बीमार मानसिकता
अपशकुन तिरिया जन्म।
बहू की सुनहरी घुंघट
दास्तां की स्पष्ट अभिव्यक्ति, बंधुआ मजदूर को चरितार्थ करती
चल रही निरंतर डगर।
अपने ही खून थोपते
औरताना स्वभाव।
फिर स्वयं में आरोपित करने को विवश
औसत नारी परजीविता का अभिशाप ढोती
आश्रय के परिवर्तन से भिज्ञ
पर स्वीकारने की घुटन
बना आभूषण, किया शोषण!
तिरिया तिरिया को दमित करती
यह भी आश्रय की कुटिल चाल।
वर्जनाओं एवं निषेधों की डगर नपुंसक समझौता का भार लिए।


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