समीक्षा: तपती धूप सी जिंदगी.. 
रेगिस्तान में महकती ,  पुष्प वाटिका 

तपती धूप सी जिंदगी.... नाम है एक उपन्यास का... जिसे लिखा है कहानी की किरदारों में समाज के मुद्दे... मानव मन की भावनाओं को अपनी कहानियाँ लिखने में सिद्धहस्त माने जाते हैं.....। यह उपन्यास एक ऐसी प्रेम कथा है.... जिसमें न होंठ काँपे.... न पलकें झुकीं... न ही प्रेम ......अभिव्यक्ति के किसी भी माध्यम से व्यक्त हुआ... लेकिन अनु और मनु बंध गए... उस बंधन में जो अनकहे और अव्यक्त प्रेम का... अदृश्य बंधन था.....। ऐसा उस दौर की कॉलेज लाइफ में संभव भी था... जब प्रेम का केंद्र जिस्म नही हुआ करता.... रूहानी प्रेम का कथानक.... पढ़ाई पूरी होते ही... बिछड़ने की स्थिति पर आ जाता है.... करार होता है.. खतो किताबत का दौर चलता रहेगा.... कुछ कुछ चलता भी है.... लेकिन उस दौर में भी.... खत में न फूल भेजे गए... न दिल... लेकिन... बंधे रहे....। वक्त का सफर जारी रहा... दोनो बिना विवाह के अपनी अपनी नौकरी में व्यस्त रहे.....। मिलन होता है एक जाड़े की ठिठुरती रात में.... और फिर अंगड़ाई लेता है वह अनकहा प्रेम... और नायक नायिका की अधेड़ उम्र में... जवान हो जाता है.... वही प्रेम...। इस बीच में भी पन्ने दर पन्ने जब उपन्यास... आगे बढ़ता है... तब भी दिल की बेकाबू धड़कन... पहलू में शोर मचाते हुए... यही कहती है... क्या होगा आगे..? कुछ और भी किरदार हैं... जिनके मिलने पर... वह भी रोते हैं.. और पाठकों की आँखें भी नम हो जाती हैं....। अंत के लिए एक गाने की ये लाइन याद आती हैं... 

सजी नहीं बारात तो क्या 
आई न मिलन की रात तो क्या 
व्याह किया तेरी यादों से 
गठबंधन तेरे वादों से 
बिन फेरे हम तेरे..... हो हो हो... 
बिन फेरे हम तेरे....।

... और रेगिस्तान के रेतीले टीलों में भी किसी जलाशय की लहरों का हिलोर मारने का अहसास कराता... या फिर उसी मरुस्थल में महकती पुष्प वाटिका में प्रवेश करवा देता है.. ये उपन्यास.....। 

इतना बढ़िया और धाराप्रवाह कथानक... रचने की महारत तो मुकेश दुबे जी की कलम में है ही.... लेकिन इसको प्रकाशित करने वाले किताबगंज के प्रकाशक भी... कमाल करने में पीछे नहीं हटे हैं....। किताब का आकार देख कर आपको.... पहली बार में यकीन ही नहीं होगा कि... यह किताब किसी भारतीय प्रकाशन की है.....। दूसरे उसका आवरण... कथानक को बयाँ करता... जिंदगी को धूप में तपाता सा....। सुंदर और आँखों को सुखद लगने वाला मुद्रण भी गज़ब ढाता है.....। असली कमाल एक और है.... जो भारतीय पुस्तक के इतिहास में अपना... अनूठा स्थान रखता है....। प्रकाशक भाई प्रमोद सागर जी ने इसको... हिंदी और अंग्रेजी दोनों में प्रकाशित किया है.... एक तरफ से शुरू करो तो हिंदी जानने वाले हिंदी में पढ़ लें..... और दूसरी तरफ से पढ़ो तो अंग्रेजी में भी पढ़ लो.....। है न... कमाल का कमाल....। तो लेखक और प्रकाशक .... दोनों को बधाई.... एक ने मर्म स्पर्शी लिखा.... तो दूसरे ने नयनाभिराम बनाया..... वाह वाह क्या बात है। एम पी मीडिया पॉइंट की टीम की तरफ से... मुकेश दुबे जी...आपके जन्म दिन पर....इससे अच्छा उपहार हमें कोरोना काल में कुछ सूझा ही नहीं.... बहुत बहुत बधाई मुकेश दुबे जी....। 
शैलेश तिवारी, संपादक
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