लेखिका

पुत्र मोह

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   किशोर छात्रावास में रहकर आगे की पढ़ाई करने जा  रहा था । सरला बेटे की जुदाई की कल्पना मात्र से पिछले एक सप्ताह से ठीक से सोयी नहीं थी ।
आखिर वह घड़ी आ ही गई ।
दरवाजे तक किशोर को छोड़ने गई, किशोर प्रणाम करने के लिए झुका सरला की आंखें धुंधली हो गई, आँसुओं की वज़ह से उन्हें कुछ दिखाई नहीं दे रहा था ।

 आशीर्वाद के लिए ज्योंही हाथ उठाई किशोर उठ खड़ा हुआ , पास ही में रखे रजनीगंधा की डाली  पर हाथ चला गया।
एक अजीब सी सिहरन मासुम और नन्हें शिशु की छूअन सा अहसास हुआ।
 कांपते हाथों में अपनेपन सा स्पर्श महसूस हुआ  । सरला के चेहरे पर एक सरल मुस्कान छा गई।
    अगले दिन वह बाजार गई और ढेर सारे पौधे गमले और मिट्टी ठेले पर लेकर घर आ गई।
श्रीकांत जी को घोर आश्चर्य हुआ जो किशोर के जाने के खबर मात्र से पिछले बीस दिनों से घर का सारा काम यत्र-तत्र निपटाने की कोशिश कर चुपचाप गुमसुम अपने कमरे में जाकर लेट जाती थी वही सरला आज कैसे बिना कोई कोई चेहरे पर सिकन लाये इन फूलों के संग सारा दिन बिता लेती है। 
शाम की चाय के साथ श्रीकांत जी को भी सरला बालकनी में ले गई। श्रीकांत जी रंग-बिरंगे फूलों और क्रौटन के पौधों को देखकर कुछ पल के लिए सम्मोहित हो गये ।
सरला चुपके से चाय की प्याली हथेली में सटा दी। मानों जैसे किसी ने जगा दिया हो;" सरला तेरे बागवानी के शौक को मैं सदा हल्के में लेता था,पर आज इनकी कशिश और सम्मोहन से मैं भी  बच नहीं सका।”
"सरला ने हंसते हुए कहा, बिल्कुल कुछ ऐसा ही पल कल मुझे भी रोमांचित कर दिया । जिस समय किशोर जा रहा था, उसी पल इन फूलों ने मुझे संभाला।
  “ जन्म-मरण आना जाना तो इस संसार का नियम है, क्यों ना हम अपने बच्चों की तरह इन पौधों से दिल बहलायें।”

आरती रॉय,  दरभंगा, बिहार

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परिचय

लेखिका साहित्य जगत सुविख्यात हस्ताक्षर हैं।आपकी रचनाओं के प्रकाशन का क्रम अटूट रहता है विगत दिनों मनीला,फिलीपींस से वह अपनी रचनाएँ प्रकाशनार्थ प्रेषित करती रही अब उन्होंने दरभंगा, बिहार(भारत) लेखन क्रम जारी किया है। आपका एमपी मीडिया पाइंट  पुनः स्वागत है।
संपादक 
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