पुरुष 

कभी पता बनकर

अपने छोटे से बच्चे के

नन्हे हाथों में एक उंगली पकड़ाकर

राह दिखाता हूँ।


कभी पुत्र बनकर

पिता के हाथों में 

अपना हाथ देकर

लाठी बन जाता हूँ।


कभी पति बनकर

सातों जन्मों के लिए

एक ही स्त्री का स्पर्श 

पाकर धन्य हो जाता हूँ।


कभी भाई बनकर

अपनी कलाई पर एक

कच्चे धागे पर प्रण लेकर

सदैव रक्षा के लिए

तत्पर प्रयासरत रहता हूँ।


कभी पुत्र बनकर अपनी

माता की गोद में 

जीवन की सारी पीड़ाएं

क्षण में भुलाता हूँ।


पर खुद के लिए समय

न निकाल सकता हूँ

न निकाल पाता हूँ।

अपनी व्यथा कहने में

तनिक संकुचाता हूँ।

जो पाप किये नहीं

अक्सर उन्हीं की सजा पाता हूँ

मैं इतना उलझा हूँ अपनों के लिए

कि किसी से कह न पाता हूँ

ये जीवन मेरा 

मेरे परिवार को

समाज के बनाये उसूलों

और परम्पराओं को समर्पित है

यही सोच कर मुस्कुराता हूँ

सबकी खुशी देखकर खुश हो जाता हूँ।

इसलिए इंसान हूँ।

इसीलिए पुरुष कहलाता हूँ।

                        

देवराज, ग्वालियर, मप्र

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