लेखक 

कोई शिकायत नहीं


यह संसार जो है मुहब्बत का
कहीं यह मायावी तो नहीं

दिखाने को बहुत कुछ है पर
यहां होता कुछ भी तो नहीं

सच कहते थे तुम मुझे
इंसान को समझना आता नहीं

अब भी अर्थों को ढूंढ रहा मैं
मुझे लफ्ज पहचानना आता नहीं

अपनी ख्वाहिशों से है जरूर
पर तुमसे मुझे कोई शिकवा नहीं

लफ्जों को कुरेदने की आदत से आहत
दुनियां से मुझे कोई गिला नहीं

मायने बातों के हों या रिश्तों के
किसी से कभी कोई शिकायत नहीं

अनमोल रत्नों की तरह सहेजे हुए
तुम्हारा एक भी लफ्ज ठुकराया नहीं

कुछ जख्म चटखकर खुले तो होंगे
फिर भी तुम्हें कभी पुकारा नहीं ।।


प्रदीप कुमार "प्राश", पटना, बिहार 

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               परिचय 


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