तय करो कहा रहोगे भारत में या इंडिया में...?


कृषि प्रधान देश भारत में किसानों को सुविधा मांगनी पड़ती हैं, ओद्योगिक इंडिया में सुविधा खुद उनके पास चल कर आती हैं

सुधीर पाठक


हैं अपना हिंदुस्तान कहा वह बसा हमारे गांवों में, लेकिन अब हकिकत बदल गई हैं। गांव शहर की और दौड रहे हैं, गांवों में सिर्फ काम के नाम पर खेती बची हैं और खेती हैं कि वह मौसम पर निर्भर हैं और मौसम हैं कि मानता नही। दूसरी तरफ इंडिया में रहने वाले हैं, उनकों हर सुविधा उपलब्ध हैं। वे सुविधा मांगने नही जाते, सुविधाए उनके पास चल कर आती हैं और वे सुविधाओं का मनमाना उपयोग करते हैं और जरूरत पडऩे पर विदेश कूच कर जाते हैं। दूसरी तरफ गांव में रहने वाले किसान हैं, जिन्हे चुनाव के समय भाग्यविधाता, अन्नदाता कहकर संबोधित करते हैं। बाद में यही अन्नदाता उन्ही भाग्यविधाताओं के सामने कभी फसल के दाम बडाने के लिए, तो कभी खाद्य के लिए तो कभी बैंक से ऋण के लिए गुहार लगाता हुआ मिलता हैं। फसले खराब होने पर हर उस चौखट पर दस्तक देता हुआ दिखाई देता हैं, जहा से उसे राहत की उम्मीद दिखाई देती हैं। हजारों हजार आवेदन, ज्ञापन दिए जाते हैं। किसी को नही पता यह आवेदन ज्ञापन कहा जाते हैं? कहा रखे जाते हैं? पर किसान जो नेताओं का चुनाव के समय अन्नदाता होता हैं इन सबसे बेखबर होकर अपनी फसल की लागत भर निकल जाए इसके लिए संघर्ष करता हैं। मतलब साफ हैं किसान को मुनाफा नही चाहिए सिर्फ जो खर्च हुआ हैं, वह मिल जाए। यह हैं कृषि प्रधान देश की हकिकत, भाग्यविधाता यह कहकर नही बच सकते कि पिछली सरकारों ने कुछ नही किया। जिम्मेदारी तो हर सरकार की ही हैं। आप भी 15 सालों से सरकार में हैं और किसान के नाम पर गाल बजा रहे हैं। आपने क्या किया? यदि यह सब आप कर चुके होते तो किसान को इतनी हायतोबा करने की जरूरत नही पड़ती। इनसब सवालों के बीच किसान को मौसम से भी निपटना पड़ता हैं। इतनी सारी कुश्तिया लडने के बाद भी मजे की बात यह हैं कि किसान की फसल का भाव तय करने का अधिकार किसान को नही? यह हैं गांवों में बसने वाले भारत की कहानी। यह हैं कृषि प्रधान देश के किसान की कहानी, जिन फसलों का वह उत्पादन करता हैं उसका भाव वह तय नही कर सकता। लेकिन इंडिया में रहने वाला चाहे संतरे की गोली बनाए, यह बिस्कुट या फिर बाईक और अन्य वस्तुए भाव तय करने का अधिकार उसका हैं। यही फर्क हैं भारत और इंडिया में? अब यह तय करना हैं कि भारत में रहे या इंडिया में? मैं (लेखक) इस पर मौन रहुगां क्योंकि यह तय करने का अधिकार मुझे नही हैं, आपकों हैं। पक्ष-विपक्ष अपनी अपनी बात कह रहे हैं, लेकिन सवाल वही हैं कि भारत और इंडिया में इतना अंतर क्यों?

सुधीर पाठक,  आष्टा (मध्यप्रदेश)

Share To:

Post A Comment: