लेखिका

चरित्रहीन

     कमरे के अंधेरे में बैठी वैदेही खुद को बाहर के शोर शराबे से दूर रखने की नाकामयाब कोशिश कर रही थी । पर जैसे ही जलते हुए रावण का शोर सुनाई दिया , उसके अंदर का शोर और तेज़ी से बिखर गया ।
        राघव , जो आज राजनीतिक दल का नेता था , हाथों में धनुष लिए रावण के पुतले को फूंक रहा था । क्या वो इस हक के काबिल है । जिसने आज से पांच साल पहले झूठे प्यार के नाम न जाने कितनी बार उसका दैहिक शोषण किया था। और विवाह के नाम पर पीछे हट गया था । न जाने कितनी ही लड़कियों के साथ वह ये दुष्कर्म कर चुका था और परिवार को मार डालने की धमकी दे कर उन्हें चुप करवा देता था । क्या सच में वो राम बन कर रावण के पुतले का दहन करने का हक रखता है...??? 
        इसी सोच ने वैदेही के मन में एक नई क्रांति का अंकुर प्रस्फुटित कर दिया था , वह समझ गई थी कि जब तक अपने अंदर के रावण को मार कर अपने अंदर राम पैदा नहीं करेंगे तब तक कलयुग का रावनरूपी राम खुद रावण के पुतले जलाकर राम बनने का दिखावा करता रहेगा और उसने उसी तय कर लिया कि आज रावण के पुतले के साथ उस कलयुग के राम के भेष में छिपे रावण  का विनाश भी उसे स्वयं ही करना होगा । और बस चल दी अपनी सोच को अंजाम देने उसी समय.......


महक छाबड़ा,

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परिचय

 मधु छाबड़ा 'महक' एम. ए. हिंदी साहित्य से हैं। स्वछंद लेखन, छंदमुक्त कविताएं, मुक्तक, ग़ज़ल, गीत, लघुकथा, कहानी, उपन्यास , लेख, संस्मरण आदि विधाओं में साहित्य सेवा कर रही हैं। आपका उपन्यास -- 'सफ़र- मेरी रूह का' सहित 8 साझा संग्रह में कविताएं, कहानियां, ग़ज़लें, संस्मरण प्रकाशित हो चुके हैं।  साहित्य सागर राष्ट्रीय मंच द्वारा 'काव्य सागर सम्मान', साहित्य सागर सम्मान', युग सुरभि सम्मान, साहित्य सागर सारथी सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है। 
संपादक
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समीक्षा 

चरित्रहीन.... महक छाबड़ा की कलम से जन्मा वह कथानक है..... जो त्रेता युग के रावण से लेकर कलियुग के रावण तक की कहानी है....। त्रेता युग के दृश्य रावण को... जो भोगी और विलासी था.... राम ने अपने बाणों के संधान से.... संहार को प्राप्त करा दिया था... लेकिन हम जिस युग में हैं.... वह कलियुग है.... जहाँ रावण अदृश्य है.... आंतरिक रूप से व्यवहार रावण का है..... बाहरी प्रदर्शन रूप राम का है..... जिसका अत्याचार कहानी की नायिका वैदेही ने सहा है..... उस रावण रूपी राघव के अंत का संकल्प..... वैदेही लेती है... और चल देती है उसका अंत करने.... कहानी विराम ले लेती है.. लेकिन संदेश यहीं से शुरु होता है....। रावण को रावण बनाने में... अगर केकसी (रावण की माँ) की भूमिका को इंकार नहीं किया जा सकता तो... आज राघव के अंदर के रावण को शक्तिशाली बनाने में....केकसी आज भी दोषी है.... लेकिन उसका साथ वैदेही भी दे रही है..... त्रेता के युग के वैदेही को भी रावण ने पटरानी बनाये जाने का प्रलोभन दिया था.... लेकिन भूमिसुता सीता ने उससे बात करने के लिए ओट.... तिनके की बनाई थी.... आज की वैदेही ने उसके प्रलोभन में स्वयं का समर्पण कर दिया..... और अन्य वैदेही को... प्रलोभन से दूर रहने का गुप्त संदेश जरूर दिया... लेकिन अपना सब कुछ खोकर...। तब तक राघव के अंदर के रावण को सफलता से शोषण करने के कारण... उत्साह बढ़ता गया... वह न केवल वैदेहियों का शोषण करता रहा..... वरन अपनी सत्ता को मजबूत कर उसका विस्तार करता रहा...। अब शक्तिशाली सत्ताधिश राघव रूपी रावण... के अंत संकल्प लिए वैदेही.... केवल घर से निकल ही पाएगी....। कहानी छोटी.. लेकिन संदेश प्रद होने के साथ..... अतीत से सबक लेकर... वर्तमान को संवारने.... और भविष्य की योजनाओं को बनाने का न्यौता जरूर देती है... अत्याचार के खिलाफ संघर्ष का....। बधाई महक जी.....। 
शैलेश तिवारी, संपादक

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