लेखक 

सुनो!

अब कहाँ वो  खुशबू
कहाँ है वो अहसास
चिट्ठियों की अलग ही थी
कुछ ख़ास ही बात.....

दिल की धड़कनें
ख्यालों का उफ़ान
वो सपनों  के महल
और नील गगन की उड़ान

कागज़ की देह में उतरती तान
रूठे महबूब को मनाती
आँसुओं संग  निकलती जान
मिलने की तड़प, बेचैनियों का तूफ़ान
याद कर प्रेयसी, उभरी अधर मुस्कान

शब्दों का इतराना, प्यार से समझाना
प्यार की सौगंधें, बिन तेरे जी न पायेंगे हम
वो हाल-ए-दिल का अफ़साना सुनाना
चिट्ठियों में था छिपा  ज़िन्दगी का तराना

अब तो बदले वक़्त के संग बदला जमाना
कहाँ रह गया रिश्तों  में अहसास पाना
भाव, ज़ज़्बात में डूबे शब्दों को गुननाना भूले  
जब से बन्द हुआ है, चिट्ठियों का आना- जाना

कहाँ वो खुशबू
कहाँ वो  अहसास....अब
 

पवन अरोड़ा, दिल्ली

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