लेखिका
जाएं तो जाएं कहाँ..?
......................................... 25 मार्च से माननीय प्रधानमंत्री जी के आदेश पर कोरोना जैसी वैश्विक महामारी की रोकने की वजह से पूरे देश में लॉकडाउन हो गया और यह उस समय अत्यंत आवश्यक भी था .....सब कुछ एकदम थम सा गया..कहीं कोई कार्य नहीं...जिसने देश की अर्थव्यस्था को हिला कर रख दिया। सिर्फ देश ही क्यों देश की जनता (लोगों) के व्यवसाय घरों की आर्थिक स्थिति भी बिगड़ने लगी...लाखों करोड़ों की संख्या में लोग बेरोजगार हो गए..ऐसे में कई घरों की आर्थिक स्थिति तो इतनी खराब हो गई कि लोग दाने दाने को मोहताज हो गए और आत्महत्या जैसे ह्रदयविदारक क़दम उठा लिए। लेकिन अब कुछ नियम हिदायतों सावधानियों क़ा आदेश देकर लॉकडाउन खोल दिया गया हैं। करीब करीब सभी व्यवसाय पुनः प्रारंभ हो गए हैं..छोटे बड़े सभी कार्य आरंभ होने लगे और लोगों की आर्थिक स्थिति धीरे धीरे सामान्य हो रही हैं। *वहीं* ऑनलाइन शिक्षा के आदेश देकर विद्यालय भी पुनः संचालित कर दिए गए...ऑनलाइन शिक्षा ही इस समय सही हैं ..क्योंकि हालात अभी इतने भी अच्छे नहीं हैं कि विद्यालय खोले जाएं ..इन विपरीत परिस्थियों में छात्रों के पढ़ाई प्रभावित ना हो उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ ना हो ..ऐसे में ऑनलाइन शिक्षा सही सटीक माध्यम हैं शिक्षा क़ा ...अतः सरकारी विद्यालय भी आरंभ हो चुके जहाँ सभी कार्य यथावत प्रारंभ हो गए। सरकारी विद्यालयों के अध्यापक घर जाकर छात्रों को पढ़ाए या फिर ऑनलाइन..शिक्षकों को भारी वेतनमान सरकार द्वारा ही मिलता हैं और अधिकांश सरकारी शिक्षक कितने समर्पित भाव से शिक्षा देते हैं ..ये हमारे देश की जनता छात्र और अभिभावक सभी जानते हैं।निजी स्वशासी
बड़े स्तर पर संचालित विद्यालय तो लगभग ग्रीष्म कालीन अवकाश या कहें तो लॉकडाउन समय में ही ऑनलाइन शिक्षा के रूप में संचालित हो गए। हमारे देश के नगरो महानगरों में बड़ी मात्रा में बड़े स्तर के स्वशासी विद्यालय संचालित हैं ..जहाँ फीस के रूप में 50-60 हजार रुपए या इससे भी ज्यादा वसूले जाते हैं और अभिभावक खुश होकर देते भी हैं। जहाँ शहर के शिक्षित सम्पन्न गणमान्य नागरिकों के बच्चे पढ़ने आते हैं..ऑनलाइन क्लास एक्टिविटी के नाम पर उन ज्यादातर विद्यालय संचालकों के पास फीस की मोटी रकम पहुँच भी गई...खैर इस बात से कोई शिकायत नहीं..जो अभिभावक सम्पन्न हैं हैसियत रखता हैं..वह तो अपने बच्चों के लिए करेगा..हर व्यक्ति अपने बच्चों को अच्छा भविष्य अच्छी शिक्षा देना चाहता हैं..अतः विद्यालय संचालकों के पास फीस पहुँच गई..स्टाफ अर्थात अन्य शिक्षकगण को भी वेतनमान मिलने लगा और छात्रों की पढ़ाई भी ऑनलाइन शिक्षा के रूप में आरंभ हो गई...मतलब..किसी क़ा कोई नुकसान नहीं हुआ सब अपनी जगह पुनः व्यवस्थित हो गया। *समस्या ज्वलंत मुद्दा*...जी हाँ अब बात करते हैं राष्ट्र निर्माण समाज निर्माण में अपना शत प्रतिशत देने वाले गली मोहल्लों छोटी बस्तियों में संचालित छोटे स्तर के हजारों लाखों विद्यालयों की ..विद्यालय संचालकों की ..वहाँ अध्यापन कार्य करा रहे शिक्षकगणों की ..देश के आगामी भविष्य इन विद्यालयों में शिक्षा ले रहे होनहार छात्रों की..समस्यायों की... वे गली मोहल्लो में संचालित छोटे स्तर के विद्यालय जो देश निर्माण समाज निर्माण में अपना संपूर्ण सहयोग दे रहे हैं। जहाँ पूर्ण समर्पित भाव से बच्चों को शिक्षा दी जा रही हैं ..जहाँ उन्हें एक विद्यालय में जो होनी चाहिए वो सभी सुविधाएं तो दी जा रही हैं लेकिन बड़े स्तर पर संचालित विद्यालयों की तरह फीस के रूप में 50-60 हजार रुपए नहीं वसूले जा रहे..जहाँ छात्रो की वार्षिक फीस तीन चार या मुश्किल से पांच हजार रुपए हैं ..जहाँ दो तीन यूनिफॉर्म नहीं होती जहाँ दिन रात एक्टिविटी ना होकर विद्यालय संचालको क़ा ध्यान शिक्षिकगण क़ा ध्यान बच्चों के मानसिक विकास व शिक्षा पर रहता हैं ..जहाँ विद्यालय संचालक क़ा उद्देश्य अपना बैंक बैलेंस ना बढ़ा कर पूर्ण समर्पित भाव से छात्रों क़ा उज्जवल भविष्य निर्माण व उन्हें शिक्षित करना हो..जहाँ अभिभावकों की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण तीन चार हजार रुपए फीस भी पूरी नहीं आ पाती...जहाँ खर्चे तो बहुत होते हैं किन्तु आय बहुत कम....जो हर साल बोर्ड परीक्षाओ में अपना शत प्रतिशत देते हैं .. इस समय विद्यालय बंद होने के कारण अपने छात्रों को शिक्षा नहीं दे पा रहे ..विद्यालय संचालक भी बच्चों की सुरक्षा व नियम कायदों के आगे मजबूर हैं *कारण* गली मोहल्लों में संचालित इन विद्यालयों के छात्रों के अभिभावकों की आर्थिक स्थिति इतनी सामान्य नहीं हैं कि वे अपने बच्चों को ऑनलाइन शिक्षा दिलवा सके...जिनके लिए अपने घर क़ा भरण पोषण करना दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल होता हैं जो साल भर में तीन चार हजार रुपए भी फीस के मुश्किल से दे पाते हैं ..या दो दो तीन तीन साल बच्चे पेड फीस पर ही पढ़ते रहते है....जहाँ पूरा मजदूर वर्ग हैं ..कोई सब्जी फल क़ा ठेला लगाता हैं कोई दुकानों पर छोटा मोटा काम करता हैं ...एक घर में चार चार छः छः बच्चे हैं ..जहाँ एक घर में छोटा कीपेड वाला मोबाइल है...सोचिए वह अभिभावक अपने बच्चों को ऑनलाइन शिक्षा कैसे दिलवा सकता हैं...जिसके पास घर में पर्याप्त स्थान व दो तीन एंड्रायड मोबाइलों की सुविधा नहीं हैं...
समस्या
इन विद्यालयों में शिक्षण कार्य करने वालों शिक्षकों की व अन्य स्टाफ की भी हैं ..जैसे विद्यालय में उपस्थित बाई या सफाईकर्मी वाहन चालक...जो पूर्ण समर्पित होकर बहुत न्यूनतम वेतन पर विद्यालय को अपनी सेवाएं प्रदान करते है..जो पूरे मन से अपना संपूर्ण ज्ञान पूरी लगन मेहनत से छात्रों को देता हैं..उनके सर्वांगीण विकास के लिए अपना शत प्रतिशत देने क़ा प्रयास करता हैं...जिसकी आय क़ा स्त्रोत सिर्फ ये न्यूनतम वेतन ही हैं ..जिसका घर परिवार ..बच्चों की पढ़ाई लिखाई मकान क़ा किराया बिजली क़ा बिल अन्य खर्चे सब इसी न्यूनतम वेतन पर निर्भर हैं वो इस समय इन सब की पूर्ति कैसे करे...उसकी आर्थिक स्थिति कैसी हैं ..वो ना तो किसी से कह सकता हैं किसी के आगे हाथ फैला सकता हैं..उसके बच्चे भी उससे सवाल करते हैं ..वो उन्हें क्या जवाब दे ..कि विद्यालय बंद होने के कारण वो बेरोजगार हैं इस समय ..वो क्या करे ..इस समय वह किस आर्थिक और मानसिक परेशानी से जूझ रहा हैं ये वहीं समझ सकता हैं ..कुछ ऐसे भी शिक्षक हैं जो स्वयं भी पढ़ रहे हैं अभी ..उनकी फीस भी इसी वेतन से जाती थी वो क्या करे ... सफाईकर्मी वाहन चालक जिनकी आय क़ा स्त्रोत सिर्फ ये छोटे स्तर के विद्यालय हैं..वो सब क्या करे ...इस ओर किसी क़ा ध्यान नहीं जाता। मैं सवाल करना चाहती हूँ शासन प्रशासन सामाजिक संस्थाओं से ..क्यों किसी क़ा ध्यान उन छोटे स्तर के विद्यालयों उन होनहार छात्रों उन शिक्षकगणों की ओर नहीं जा रहा ..वह विद्यालय संचालक क्या करे जो अपने छात्रों को शिक्षा देना चाहता हैं ..जहाँ अभिभावक आकर निवेदन करते हैं ..आप विद्यालय खोल लीजिए ..बच्चों क़ा भविष्य खराब हो रहा हैं ...हम ऑनलाइन पढ़ाई कराने में असमर्थ हैं ...जो अपने स्टाफ शिक्षकगण की आर्थिक स्थिति में ज़्यादा सहायता नहीं कर पा रहा..वो छात्र जो पढ़ना तो चाहते हैं लेकिन आर्थिक तंगी की वजह से ऑनलाइन पढ़ाई करने में असमर्थ हैं शासन प्रशासन या किसी के पास कोई हल हैं इस समस्या क़ा कोई जबाब हैं..विद्यालय संचालक..शिक्षकगण..विद्यालय के अन्य कर्मचारी..विद्यार्थी ..अभिभावक क्या करे ....आखिर जाएं तो जाएं कहाँ..?


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