बज रही है खतरे की घंटी.... जागो.... 


शैलेश तिवारी 

याद कीजिये इसी साल का वह 22 मार्च.... जब शाम पांच बजे....पांच मिनट तक पूरे देश ने ताली.... थाली... शंख... घड़ियाल सब कुछ बजाए... देश के नेतृत्वकर्ता के आव्हान पर....।.. लक्ष्य था... "गो कोरोना.. गो"..... लेकिन हासिल कुछ हो पाता इससे पहले ही.... पांच अप्रेल की रात नौ बजे ... नौ मिनट तक घरों की लाइट बंद रखनी थी... दिए जलाने थे..... मोबाइल की टॉर्च से रोशनी करना थी.... उद्देश्य था... "गो कोरोना.. गो"....। दोनों आव्हान.. देश के पीएम साहब ने किए...। दोनों ही प्रयासों की जानकारों ने ऐसी वैज्ञानिक व्याख्या की थी... कि न्यूटन, आईंस्टीन जैसे वैज्ञानिक भी फैल हो जाएं...।हालांकि अब उन वैज्ञानिकों ने हाल  फिलहाल अपना ध्यान.....कोरोना से भी ज्यादा जरूरी सुशांत की आत्म हत्या वाले मामले में लगा रखा है.....ताकि उन रहस्य से पर्दा उठा सकें....जिनसे बिहार के चुनाव जीते जा सकें.....साथ ही एक के साथ एक फ्री की तर्ज पर... महाराष्ट्र सरकार को अस्थिर कर....एमपी और राजस्थान वाला राजनीति का खो खो का खेल दोहराया जा सके...। खैर मुद्दे पर लौटते हैं....उस समय ये कोरोना को भगाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया..... पर दोगले चीनियों का वायरस भी इतना दोगला निकलेगा हम जान ही नहीं पाए... उस धूर्त कोरोना ने इसको अपना "वेलकम" मान लिया... और पसारने लगा अपने पैर भारत में....। वो भी इतनी तेज रफ्तार से कि..... अब भारत कोरोना के कुल संक्रमित मरीजों की सूची में दूसरे स्थान पर है... और गज़ब यह कि प्रतिदिन के संक्रमित मरीजों की संख्या में... भारत के मुकाबले दुनियाँ का कोई देश.... नजदीक फटकने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहा है.....। 

ये हुआ अतीत का एक हिस्सा ..... अब हम आपको दूसरे हिस्से की तरफ ले चलते हैं..... जहाँ बीते पांच सितंबर को..... शाम पांच बजे.... पांच मिनट तक एक बार फिर थालियां बजी.... तालियां बजी..... लेकिन मुख्यधारा की मीडिया में इसका कवरेज न के बराबर रहा....। बताते चलते हैं कि इस दिन ये... तालियां और थालियां.... देश के विभिन्न शहरों में उन ढाई करोड़ बेरोजगार नौजवानों ने रैली निकालते हुए बजाई थी कि.... 2018 में इन युवाओं से रेलवे की लगभग एक लाख 42 हजार रिक्तियों के लिए आवेदन लिए गए थे..... तीन केटेगरी के खाली पदों के लिए.... इतना लंबा समय बीत जाने के बाद भी परीक्षाएं आयोजित नहीं की गई....। जब पांच सितंबर को ताली और थालियां बजी तो..... शाम छः बजे रेल मंत्री ने .... रेल बोर्ड के अध्यक्ष के अनुसार जानकारी दी कि.... परीक्षाएं आगामी 15 दिसंबर 20 के आसपास आयोजित हो जायेंगी......। अब घटना बीती रात यानि नौ सितंबर रात नौ बजे की.... नौ मिनट तक... देश के अनेक हिस्सों में बेरोजगार युवाओं ने.... घर की लाइट बंद की... दीपक जलाये... और मोबाइल की टॉर्च से भी रोशनी की....... उद्देश्य था सरकार को इस बात के लिए जगाना कि..... 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान ये जुमला उछला था कि.... दो करोड़ युवाओं को रोजगार दिया जाएगा....। अब तो लोगों की लगी लगाई नौकरियां जा रही हैं.... अथवा और भी जाने वाली हैं....। कुछ कीजिये सरकार..... वेतनभोगी वर्ग की लगभग दो करोड़ नौकरियां जा चुकी हैं.... ये संगठित क्षेत्र का आंकडा है... असंगठित क्षेत्र इस आंकड़े में शामिल नहीं है......। 

इतना सब कुछ घट रहा है..... सरकार मौन हैं.... वो भी बेताली मौन... जिसे हठी विक्रमार्क ही कोशिश करके तुडवाता था.... लेकिन इस बेताली सरकार के मौन भंग करने के लिए.... युवाओं ने विक्रम की भूमिका स्वीकार कर ली है....। जो लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत माने जा रहे हैं......। इसका दूसरा पक्ष है.... लगातार बोलते रहने की भूमिका निभाने वाला....मुख्यधारा का मीडिया.....! आश्चर्यजनक तरीके से.... वह जनता की इस आवाज को सुनने की शक्ति खो बैठा है..!!!!! 

जिस कोरोना की वजह से जो देश... महंगाई, बेरोजगारी, धराशायी अर्थव्यवस्था, छिनते रोजगार, के साथ साथ चीन के साथ सीमा का तनाव भी झेल रहा है..... उस देश की मीडिया को वह कुछ भी नजर नहीं आ रहा है... उसको सुशांत की आत्महत्या का प्रकरण इतना ज्यादा जरूरी लग रहा है कि... दो महीने से सी बी आई की तरह खोजबीन में जुटा है....। ज्वलंत मुद्दों से ध्यान भटकाने की सरकारी नौकरी में लिप्त है.... जबकि आर्थिक संकट के दौर की काली छाया से.. मीडिया खुद भी नहीं बचा है...। इसका कारण है जनता द्वारा वह सब देखा जाना जो वह दिखा रहा है...। सवाल उठेगा कि... इसके अलावा किया भी क्या जा सकता है....। जवाब है उन मीडिया को पढ़ना और देखना बंद किया जाए.... जो जनता की तरफ से उसके दुःख दर्द के सवाल सरकार से नहीं पूछ रहे हैं...। उनका सरकारी भोंपू हो जाना..... एक प्रकार से लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है.....। 

शैलेश तिवारी

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