लेखिका 

साहित्य के चोर दरवाजे यानि शवों पर नदियाँ पार करना 

इलाहाबाद की लेखिका शकुन्तला सिरोठिया बाल साहित्य में एक सम्मानित नाम है। लगभग 92 वर्ष की आयु तक वे साहित्य सेवा करती रहीं। उन्होंने वरिष्ठ बाल साहित्यकारों के लिए एक पुरस्कार की भी व्यवस्था की थी जो उनके जाने के बाद शायद बंद हो गया है, मैं जो बात कहने जा रही हूँ वह सम्भवतया अस्सी के दशक की है। उनकी आयु भी तब अस्सी वर्ष के ऊपर थी। हुआ यूँ कि उस वर्ष उन्हें हिन्दी संस्थान लखनऊ से 15 हज़ार रुपए का पुरस्कार प्राप्त हुआ था और उसी वर्ष इलाहाबाद की एक गुमनाम-सी युवा कवयित्री की तीन पुस्तकें एक साथ एक प्रकाशन से आ गईं। उस समय पैसे देकर पुस्तकें प्रकाशित करने का रिवाज नहीं था अतः इसे एक उपलब्धि माना जा रहा था, परन्तु भीतरी सच्चाई को जानने वाले वरिष्ठ लेखक वर्ग में एक क्षोभ भी था। तब हम लोग एक-दूसरे को पोस्टकार्ड भी लिखते थे। सूचना मिलने पर मैंने उन्हें बधाई का पत्र लिखा तो तुरन्त जवाबी पोस्टकार्ड आया। लिखा था, ‘‘कुछ लोगों को शवों पर नदियाँ पार करने की आदत होती है (स्पष्ट संकेत इलाहाबाद की उन्हीं स्वनामधन्य लेखिका की ओर था) हम जैसे तो गंगा के किनारे खड़े रहते हैं। कभी-कभार एकाध छींटा गंगाजल का हम पर भी आ पड़ता है।’’ उत्तर में मैंने लिखा ‘‘दीदी! जो लोग शवों पर नदी पार करते हैं, दुर्गन्ध उन्हीं को झेलनी पड़ती है। हमारे लिए तो गंगा के दर्शन ही पर्याप्त हैं। आप मन दुःखी मत करें।’’ पर यह तो पुरानी बातें हो गई। आज ज्यों-ज्यों भ्रष्टाचार के विरोध के स्वर मुखर होने लगे हैं उसी अनुपात में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। नित नए चोर दरवाजे साहित्य के क्षेत्र में भी खुलते जा रहे हैं।
आये दिन कहीं न कहीं से ऐसे पत्र प्राप्त होते रहते हैं, ‘‘हम आपको सम्मानित करना चाहते हैं, कृपया 1000/- सदस्यता शुल्क भेज दीजिए, 500/- भेज दीजिए। इलाहाबाद की ही एक संस्था है, कुछ वर्ष पहले 2500/- की माँग कर रही थी। मैं वैसे तो ऐसे पत्र फाड़कर फॅेंक देती हूँ, किन्तु इस संस्था के अध्यक्ष से पुराना परिचय होने के कारण और उनका फोन आने पर मैंने फोन पर उन्हें कहा कि आप ऐसा क्यों कर रहे हैं? तो उत्तर मिला ‘हम पैसा कहाँ से लायें?’ यानि तुम्हारा ही सर और तुम्हारा ही जूता। सोचने वाली बात तो यह है कि सम्मानित होना क्या इतना ही आवश्यक है? लेकिन यह सम्मानित होने का नशा भी कुछ कम नहीं होता। बेचारे नए लेखक जिन्हें लेखनी पकड़े अधिक समय नहीं हुआ होता और रातों-रात प्रथम श्रेणी के लेखकों के साथ अपना नाम जोड़ने का चाव भी होता है, वे बड़े उत्साह से ऐसी संस्थाओं को धन देते हैं तो संस्था क्यों न ले?
साहित्यकार होना तो तपना होता है पर साहित्यकार बनना आजकल फैशन बन गया है। अब यह होने और बनने के अन्तर को मैं नहीं समझा सकूँगी। लोग-बाग अपनी अप्रकाशित पुस्तकों पर भी पुरस्कार मिलने की घोषणा कर देते हैं, चाहे पुरस्कृत करने वाली संस्था को इससे कुछ लेना-देना भी न हो। उसे तो लेना-देना मात्र अपने सदस्यता शुल्क से होता है। 
आज का युग बराबरी का युग है। कहीं वर्गभेद नहीं, कहीं लिंगभेद नहीं परन्तु महिलाओं को यहाँ पर भी कुछ विशेषाधिकार मिलते हैं, उन्हें महिला होने का लाभ उठाने का अवसर सहज ही प्राप्त हो जाता है। फिर महिलाएँ इसमें पीछे क्यों रहें? इस पर भी यदि वह सुन्दर भी होे और चतुर भी तो कहना ही क्या? पाँचों अंगुलियाँ घी में। ऐसे प्रकरणों में शवों से उठने वाली दुर्गंध की उक्ति निरर्थक हो गई है। बेचारे तापस साहित्यकार गंगाजल की आस में स्वर्ग सिधार जाते हैं और सारा का सारा गंगाजल गंदी नालियों में जा मिलता है। आपको अपना अधिकार लेना है तो किसी चोर दरवाजे का सहारा लेना ही पड़ेगा अन्यथा गंगाजल की आस भी मत लगाइए।

आशा शैली, नैनीताल, उत्तराखण्ड

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परिचय

आशा शैली जी का जन्म अस्मान खट्टड़-रावलपिंडी  (अविभाजित भारत) में हुआ लेकिन वह वर्तमान में इंद्रा नगर नैनीताल, उत्तराखण्ड में निवास करती हैं। 
कविता, कहानी, गीत, ग़ज़ल, उपन्यास, बाल साहित्य आदि प्रत्येक विधा में आपकी लेखनी समान अधिकार रखती है। आप मुख्य रूप से हिन्दी के साथ साथ  पंजाबी, पहाड़ी, (हिमाचली डोगरी-महासवी), उर्दू, ओड़िआ आदि भाषाओं में भी साहित्य सृजन करती हैं। 
सभी विधाओं पर आपकी लिखी 24 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। 
देश की अधिकांश  पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं। आकाशवाणी, दूरदर्शन से भी आपकी रचनाओं का लगातार प्रसारण होता रहता है। 
कवि सम्मलेन और साहित्यिक मंचों में भी आप की सक्रिय सहभागिता बनी रहती है। 
आपको उत्तराखण्ड सरकार द्वारा प्रतिष्ठित राज्य स्तरीय तीलू रौतेली पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। 
आप शैलसूत्र (त्रैमासिक) का प्रकाशन-सम्पादन भी करती हैं।  आरती प्रकाशन  की संस्थापक भी हैं। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है। 
संपादक
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