नशा शराब मे होता तो नाचती बोतल.......
संपादकीय
राजेश शर्मा
हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी आज 2 अक्टूबर से 8 अक्टूबर तक मद्य निषेध सप्ताह की रस्मादायगी की जाएगी। शासन ने फरमाया है कि महात्मा गांधी की जयंती पर वर्चुअल व्याख्यान आदि आयोजित कराये जायेंगे, नशामुक्ति पर आधारित संदेशों को स्थानीय व्हाटसएप ग्रुपों में भिजवाया जाएगा, पेम्पलेट, नशाबंदी साहित्य आदि का वितरण होगा और नशाबंदी पर आधारित वीडियों फिल्मों को व्हाटसएप, शासकीय फेसबुक, ट्वीटर पर अपलोड किया जायेगा। मगर सवाल लोगों के जहन मे जो वर्षों से उठता आया है वह यह कि एक को छोड़ बाकी नशे की लतों को छुड़ाने के लिए क्या खुदा को आसमां से जमीं पर आना होगा?
नशा शराब मे होता तो नाचती बोतल... दरअसल नशा तो व्यवस्था को है। नशे से मुक्त कोई नहीं....किसी को दौलत,किसी को शोहरत, किसी को मोहब्बत, नफरत या बहुमत का नशा छाया हुआ है। दूसरी तरफ मादक पदार्थ गांजा,अफीम,चरस,भांग..देशी-विदेशी शराब भी समाज मे दंड पीलने से बाज नहीं आ रहे।
मेडिकल स्टोर पर रखे कफ सीरफ नशेलचियों के लिए टानिक बन गए, लॉकडाउन के वक्त जब शराब दुकानों की शटरें डाउन थीं तब युवाओं ने सेनिटाइज़र और कफ सीरफ का सेवन कर अपनी प्यास बुझाई यह बात भी किसी से छिपी नहीं है। ऐसे मे स्वस्थ समाज की कल्पना सिर्फ़ कपोल कल्पना ही बनकर रहेगी नहीं तो और करेगी भी क्या!!
शहरों मे शराब का सेवन फैशन बनता जा रहा है वहीं देहाती इलाकों मे शराब का व्यसन परिवार को आर्थिक और शारीरिक रुप से कंगाल बनाता जा रहा है। बावजूद इसके, राजस्व के लालच मे आकंठ डूबी सरकारें खुद नशे मे नज़र आने लगी हैं। शासन का आबकारी विभाग तो ऐसे है जैसे धृतराष्ट्र ने शर्माकर खुद उसे अपनी कुर्सी गिफ्ट की हो..।
प्रिंट,इलेक्ट्रॉनिक,वेब मीडिया पर प्रतिदिन शराब के दुष्प्रभाव को लेकर खबरें देखी जा सकती हैं। ज्यादातर क्राइम की जड़ों को शराब से सींचा जा रहा है। घटिया व जहरीली शराब के सेवन से मरने वाले लोगों के समाचार देश के कोने-कोने से निकलकर आ रहे हैं।ऐसी सूरत मे शराब के अवैध कारोबारियों पर शिकंजा कसना समय की मांग नहीं बनता क्या ?
अगर इसी सप्ताह की खबरों को लेकर बात की जाए तो राजधानी भोपाल और उससे सटे जिले रायसेन,सीहोर,विदिशा,होशंगाबाद मे कच्ची और देशी शराब के छुटपुट कारोबारी पुलिस के हत्थे चढ़े, लॉकडाउन के वक्त राजगढ़ जिले मे अवैध शराब की फैक्ट्री का खुलासा हुआ...
नीमच,मंदसौर,जावद,मनासा तो मादक पदार्थों का अड्डा बने हुए हैं। इस क्षेत्र मे गांजा,भांग,चरस,अफीम,डोडा चूरा आदि मादक पदार्थ लोगों की दिनचर्या मे शामिल दिखाई दे रहे हैं____यहां तसल्ली वाली बात यदि कोई नज़र आ रही तो वो सिर्फ यह कि, ऐसे अवैध धंधों मे लिप्त आरोपियों को कताई नहीं बख्शते हुए अदालत उन्हें (मौत के सौदागरों) को सीधे जेल की राह दिखा रही है।
मादक पदार्थों के अवैध कारोबारियों से पुलिस का दोस्ताना संबध चिंता का विषय बनता जा रहा है। मीडया मे तो यहां तक खबरें हैं कि स्टिंग आपरेशन हो तो पुलिसकर्मियों को भी...नशे के 'लतियल' अवस्था मे पकड़ा जा सकता है।
मध्यप्रदेश ,उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान ,महाराष्ट्र आदि प्रांतों में ज़हरीली शराब से हुई मौतों ने एक बार फिर इस सवाल को हमारे सामने रख दिया है कि आख़िर 'कच्ची शराब' बनाने में वो क्या ग़लती है जिससे ये ज़हर बन जाती है...
ऐसा भी नहीं है कि देशी शराब बनाने, बेचने और पिलाने का धंधा नया है और देशी शराब के कारोबार में ज़हर का क़हर कभीकभार ही टूटता है।
जब से ये कारोबार है...तब से इस तरह की मिलावट का सिलसिला जारी है. कई बार देश के कई हिस्सों से ज़हरीली शराब के कारण मौत की ख़बरें आ चुकी हैं। और आती जा रही हैं।
देशी शराब जिसे आम बोलचाल की भाषा में 'कच्ची दारू' भी कहते हैं, उसका रासायनिक सच बहुत ही साधारण सा है...
कच्ची शराब को अधिक नशीली बनाने के चक्कर में ही ये ज़हरीली हो जाती है. सामान्यत: इसे गुड़, महुआ आदि से तैयार किया जाता है।
लेकिन इसमें यूरिया और बेसरमबेल की पत्तियां डाल दी जाती हैं ताकि इसका नशा तेज़ और टिकाऊ हो जाए.
शराब को अधिक नशीली बनाने के लिए इसमें प्रतिबंधित ऑक्सिटोसिन मिला दिया जाता है, जो मौत का कारण बनती है.
हाल के सालों में ऑक्सिटोसिन को लेकर ये जानकारी सामने आई है कि ऑक्सिटोसिन से नपुंसकता और नर्वस सिस्टम से जुड़ी कई तरह की भयंकर बीमारियां हो सकती हैं.
इसका सेवन कई भयंकर बीमारियों का जनक है।
कच्ची शराब में यूरिया और ऑक्सिटोसिन जैसे केमिकल पदार्थ मिलाने की वजह से मिथाइल एल्कोहल बन जाता है जो लोगों की मौत का कारण बन जाता है.
वैज्ञानिकों के मुताबिक़ मिथाइल शरीर में जाते ही केमिकल रिएक्शन तेज़ होता है. इससे शरीर के अंदरूनी अंग काम करना बंद कर देते हैं और तुरंत मौत हो जाती है.
लोगों को बेमौत मारने वाले इस सिस्टम को समूल नष्ट जबतक नहीं किया जाएगा तबतक मद्य निषेध सप्ताह मनाया जाना किसी को कैसे गले उतर सकता है।
इस रस्मादायगी के बजाए शराब माफियाओं को सलाखों मे डाला जाना चाहिए। महात्मा गांधी ने कहा था कि "जिस शराब को आप पी रहे हैं वो गरीबों का खून है" तो क्यूँ न गरीबों का खून पीने वालों से पहले "पिलाने"वालों पर निर्णायक कार्यवाही की जाए....
और दो अक्टूबर से सरकारी नुमाईंदे भी अपनी ड्यूटी प्रतिदिन खुद अपनी गिरेवां मे झांककर करना शुरु कर दें...
मौजूदा दौर मे उठाया गया उपरोक्त कदम गांधी जी के रुह की शायद सबसे बड़ी "तसल्ली" साबित हो...


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