श्रद्धांजलि
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अंबादत्त भारतीय मरे नहीं - अंबादत्त भारतीय मरते नही,

नसरुल्लागंज मे होगा 25 अगस्त को होगा याद मे उनके कार्यक्रम,

जिनके खिलाफ उठती रही उनकी कलम उनमें से एक भी आमंत्रित नहीं,

इससे ज्यादा बड़ी बाबा भारतीय को ओर क्या हो सकती श्रद्धांजलि 


राजेश शर्मा

सीहोर जिले की एक धारधार कलम 6 वर्ष पहले आज ही के दिन हमारे देखते ही देखते पत्रकारिता को अलविदा कह गई थी । वैसे तो सीहोर की माटी को पत्रकारिता की नर्सरी कहा जाता है जो महान पत्रकारों की आज भी कर्म स्थली के रुप मे प्रदेश स्तर पर जाना पहचाना जाता है। जिन पत्रकारों की वजह से सीहोर को पत्रकारिता की नर्सरी कहा जाता है उन पत्रकारों मे अंबादत्त भारतीय अपना विशिष्ट स्थान इसीलिए रखाते हैं क्योंकि उन्होंने जीवन पर्यन्त सीहोर को नहीं छोड़ा और किराये के कच्चे मकान मे संघर्ष करते हुए अपना पूरा जीवन  पत्रकारिता के लिये होम कर दिया। वह चाहते तो प्रतिष्ठा, पैसों और पदों के लालच मे अपना जमीर बेचकर सीहोर से महानगरों की तरफ कूच कर भी जाते लेकिन उन्होंने  जिले मे पत्रकारिता के रक्षार्थ ऐसा कदम नहीं उठकर अपने-आप को महानतम पत्रकार निरुपित कर दिया। 


बाबा के मित्र उन्हें सीहोर छोड़ने की सलाह देते रहे वे कहते थे आपकी जरुरत महानगर की पत्रकारिता को है। जिसे वे एक कान से सुन दूसरे कान से निकालते रहे। 
करीब 40 वर्ष तक पत्रकारों के हित मे चौतरफा उनकी लड़ाई प्रदेश स्तर पर बेमिसाल है। 

रंगमंच,राजनीतिक मंच,साहित्यिक मंच,सामाजिक मंच और इतिहास के पन्ने आज भी गर्व से उनकी गाथा बोल रहे हैं। वह भ्रष्ट ,चाटुकारो एवं  राजनितिकबाजों की हमेशा किरकिरी बने रहे।

लेकिन उन्होंने बिना मूंह खोले सभी को अपनी कलम से जवाब दिया। और चारों कोने चित कर दिया। स्कूल,कालेज से शिक्षा ग्रहण कर उन्होंने आध्यात्मिक शिक्षा स्वाध्यायी तौर पर ग्रहण की। वे अच्छे भविष्यवक्ता के रुप मे जाने जाते थे। जैसे के साँथ तैसा व्यवहार उनकी खासियत थी। वे व्यवस्था के खिलाफ हर तरीके से जंग लड़ना जानते थे। वह हिंदी ,अंग्रेजी , उर्दु ,संस्कृत के साँथ अनेक क्षेत्रीय भाषा के ज्ञाता थे। यही कारण है कि आखिरी तक उनका घर पत्रकारिता का निजि संस्कारमय संस्थान बना रहा ।

 सीहोर जिले की पत्रकारिता के अखाड़े मे उनके द्वारा उतारे पहलवान अपराजित दंड पेलते आज भी दिखाई दे रहे हैं। जिनमे नसरुल्लागंज के सुरेश जैमिनी प्रमुख रुप से शामिल हैं। पत्रकार जैमिनी, बाबा के सिद्धांतों के अग्रणी ध्वजवाहक हैं। मुझे यह कहने मे कदापि हर्ज नहीं।

बाबा भारतीय के विषय मे कहा जाए तो वह महाराणा प्रताप के जीवन से बहुत ज्यादा प्रभावित रहे यही वजह है कि उन्होंने अपने अविवाहित जीवन काल मे कुछ हद तक उसे आत्मसात भी किया। और सीहोर की पत्रकारिता के साम्राज्य को कभी खंडित नहीं होने दिया । वह हमेशा कहते रहे कि मै गुलामी की हलवा-पुरी से स्वतंत्रता की घांस बेहतर समझता हूँ और मैं वर्तमान के लिए नहीं भविष्य के लिए पत्रकारिता करता हूँ।
लगता नहीं कि बाबा भारतीय आज हमारे बीच नहीं हैं। सीहोर जिले की धरा पर उनके द्वारा रोपित पौधे आज वृक्ष बन गए हैं। इससे बड़ी कमाई एक पत्रकार के लिए हो भी क्या सकती थी।
आज उनकी छटवीं पुण्यतिथि के अवसर पर समस्त पत्रकारों की तरफ से बाबा को श्रद्धासुमन अर्पित हैं।
और हां लिखने मे आता तब है जब उनके सिद्धांतों के खिलाफ उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर जब कोई आयोजन होते हैं। ऐसे आयोजन बाबा भारतीय की आत्मा को क्या शांति प्रदान कर पाएंगे!!
पुण्यतिथि पर भी नेतागिरी या चमचागिरी कहाँ तक उचित है?

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