कथा के अंतिम दिन उमड़ा आस्था का सैलाब, 
निकाला चल समारोह,
नि:स्वार्थ मित्रता का उदाहरण है भगवान श्रीकृष्ण और भक्त सुदामा
सीहोर 21 दिसंबर,2019
एमपी मीडिया पाइंट 

नि:स्वार्थ मित्रता का उदाहरण है भगवान और भक्त सुदामा। सुख के सब साथी है, सच्ची मित्रता की पहचान विपत्ति के समय होती है। मित्रता निभाना सीखनी हो तो श्रीकृष्ण-सुदामा से सीखिए। उनका चरित्र नि:स्वार्थ दोस्ती का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है। उक्त विचार शहर के चाणक्यपुरी स्थित मां राजरोजश्वरी मंदिर के समीप जारी सात दिवसीय भागवत कथा के अंतिम दिन कथा वाचक पंडित श्री रवि शंकर तिवारी ने कहे। श्रीमद् भागवत कथा का समापन शनिवार को हवन पूर्णाहुति एवं महाप्रसादी के साथ किया गया। कथा के समापन के दिन मां राजरोजश्वरी मंदिर समिति के द्वारा समिति के पदाधिकारियों और क्षेत्रवासियों का सम्मान भी किया गया और शाम को भव्य चल समारोह निकाला गया। कथा के अंतिम दिन समिति के अध्यक्ष अतुल तिवारी ने आभार व्यक्त किया।
कथा वाचक पंडित श्री तिवारी ने कहा कि मित्रता का अनूठा उदाहरण भगवान श्री कृष्ण ने पेश किया। भगवान ने जैसे ही सूचना मिली की उनका मित्र सुदामा उनसे मिलने आया है तो वह नंगे पैर दौड़ते हुए आए और सुदामा को गले लगा लिया। उन्होंने कहा कि सुदामा अपने ब्राह्मण धर्म का निर्वहन करते हुए भिक्षा मांग कर जीवन यापन करते थे। उनके घर की हालत लगातार खराब होती जा रही थी। इसके बावजूद उन्होंने कभी श्रीकृष्ण से मदद नहीं मांगी। पत्नी के जिद करने पर वह श्रीकृष्ण के दरबार में गए। लेकिन अपनी गरीबी और दयनीय दशा को नहीं बताया। तब प्रभु ने बिना मांगे ही उन्हें धन और वैभव प्रदान कर दिया। भगवान भक्तों का हर संकट दूर करते हैं। भक्तों पर जब भी संकट आता है और तो भगवान उनके संकट को हर लेते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों के प्राणों की रक्षा की थी।
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