शैलेश तिवारी
दुनियाँ के सबसे बड़े गणतांत्रिक देश का गणतंत्र ठीक उस मौके पर मनाए जाने की दहलीज पर खडा है जब उसे डेमोक्रेसी इंडेक्स में दस स्थान फिसलना पड़ा है। इसकी साफ वजह भी है कि तंत्र एक नक्करखाने में तब्दील होता जा रहा है तो गण कि औकात अब तूती से ज्यादा रही नहीं? जिस नौकरशाही तंत्र को लगाम लगाने के लिए गण ने जन के तंत्र को चुना। उस नौकरशाही ने सत्ता के वंदन और कहीं कहीं तो चरण चुंबन का नुस्खा आजमा लिया, वो भी सफल तरीके से। ले दे के गण की आशाओं का केंद्र स्थापित तीसरा स्तंभ न्याय तंत्र का ही है और राहत भरा न्याय मिलता भी रहा है। चौथे अनुल्लेखित स्तंभ, संचार(मीडिया) तंत्र ने सत्ता बदलने के साथ सुर बदलने का खासा अभ्यास आजादी के बाद से अभी तक बखूबी कर लिया है।यह पहला ही अवसर है जब हम 1950 में लागू हुए संविधान का वार्षिक दिवस मनाने की दहलीज पर खड़े हैं और गण उसी संविधान के उल्लंघन को लेकर सड़कों पर है। तंत्र उनसे बात करने की कोई पहल नहीं करता तो जन का मन सड़कों से घर लौटने को तैयार नहीं। गणतंत्र दिवस की पूर्व बेला पर गण की मुट्ठियाँ आकाश की और तनी है, नारे लगा लगा कर कंठ सूख रहे हैं कि आर्थिक मंदी के दौर से देश को बाहर निकालने का कोई कदम तो उठाइये हुजूर। 45 सालों में बेरोजगारी के आकाश छूते आंकड़े को देश के युवाओं के लिए जमीन पर लाने के ठोस योजनाएं लागू करो सरकार।सरकार सबको रोजगार नहीं दे सकती यह सत्य है लेकिन रोजगार के अवसर पैदा तो कर सकती है। नए उद्यमों को प्रोत्साहन देकर। लगातार बंद होते उद्योगों को राहत की आक्सीजन उपलब्ध कराएं जन सेवक जी। जनता के लिए, जनता के द्वारा चुने गए जन प्रतिनिधियों जन के प्रति उदासीन भाव त्यागिए... उस अन्नदाता की किस्मत का दरवाजा खोलने का प्रयास कीजिए जिस पर लगातार बंद रहने से जंग की परत गहरी होती जा रही है। नतीजा यह कि वह खुदकुशी को अंतिम विकल्प के रूप में चुन रहा है। रसोई गैस से लेकर हर खाद्य उपयोगी वस्तु थाली में लाने तक महंगी होती जा रही है।
इन विषम और विपरीत परिस्थिति में भी गण बोल तो वंदे मातरम रहा है। भारत माता के जयघोष के साथ तंत्र से गण की अपेक्षा आशावान है और यह आश्वस्त करती है कि तंत्र से गण का विश्वास उठा नहीं है। यही हमारे गणतंत्र का मजबूत आधार है। और यही हमें विश्व में अलग पहचान भी दिलाता है। इसीलिए तो कहते हैं सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तां हमारा....... वंदे मातरम्।


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