हम पहले भारतवासी हैं इसके बाद ही मद्रासी, पंजाबी, बंगाली, गुजराती, मराठी आदि आदि हैं। यह बात देशवासियों के दिल में गहरे से तब उतर पाई, जब हमारे देश का युवा रोजगार के बेहतर अवसरों को भुनाने साथ समंदर पार जाने लगा। मगर अंग्रेजों से सत्ता छिना कर स्वराज और राम राज्य की स्थापना का मनोहारी, सुखद स्वपन दिखाए। जन सामान्य को अपनी तरफ आकृषित बनाए रखने के लिए।
सत्ता पुरुषो का यह खेल सार्वजनिक दिखावे के लिए आज भी जारी है। जबकि व्यक्तिगत रूप से भिन्न भिन्न दल के राजनेता एक दूसरे के घनिष्ठ मित्रों की सूची में शामिल हैं। मगर इन सत्ता लोलुपों ने जनता के बीच खाई चौडी और गहरी करने के किसी भी अवसर को जाया नहीं किया। राजनेताओ ने फूट डालो और राज करो.... की अंग्रेजों की नीति को सत्ता की आवश्यक नीति के रूप में जस का तस स्वीकार कर कर लिया। मजे की बात यह है कि इसमें इन्होंने इतना भी विचार नहीं किया कि आखिर नुकसान तो उनके अपने देश का ही हो रहा है। वो जनता को वर्गों में बांटते रहे और भले देश की भोली जनता ने उन्हें देश का न केवल कर्णाधार बनाया वर्ग उन्हें भाग्यविधाता के रूप में प्रतिष्ठित कर उनके पीछे चलना कर्तव्य भी मान लिया।
ऐसे भाग्यविधाता ने जब यह समझ लिया कि प्रादेशिक और भाषावाद सहित अन्य बंटवारे की लकीरें फीकी पड़ती जा रही हैं तो उन्होंने अब इसे एक नया रूप दिया जो भाजपाई, कांग्रेसी, सपाई, बसपाई, आदि आदि कई खंडों में विभाजित कर दिया। इस मामले में बुराई वहाँ तक नहीं है जब तक हम बातोर भारतीय नागरिक एक वोटर हैं और हमें अपने पसंद के पार्टी उम्मीदवार को वोट देने का हक है। मतदान केंद्र में हमें इस फ़र्ज़ को आवश्यक रूप से निभाना भी चाहिए । बूथ से बाहर आते ही हमें भारतीय नागरिक बम जाना चाहिए लेकिन ऐसा हम करना भी चाहें तो करने नहीं दिया जाता। इसको पूरे पांच साल तक ये राजनैतिक दलों के नेता शानदार अभिनय कर जानदार तरीके से सींचते हैं।
चलिए आज 26 जनवरी 2020 के जिला सीहोर में मनाए गए प्रमुख गणतंत्र दिवस समारोहों की झलकियाँ उदाहरण में लेते हैं। जिला मुख्यालय में प्रदेश सरकार पर काबिज काग्रेस पार्टी के नेता और काबिना मंत्री झंडा फहराने आए तो भाजपा के नेता वहाँ न के बराबर ही रहे। इछावर के मुख्य समारोह में भाजपा के नेताओं का कब्जा रहा वहाँ कांग्रेस के नेता नदारत रहे। यही हाल आष्टा, बुधनी और नसरुलागंज ब्लॉक का भी रहा। जबकि प्रशासकीय स्तर से आमंत्रण पत्र सभी को भेजे जाते हैं।
यह उदाहरण और दृश्य हम सभी भारतीय लोगो को यह सीख देते हैं कि राष्ट्रीयता पर राजनीति हावी होती जा रही है। वो भी उस समय जब देश का भविष्य माने जाने वाले नौनिहाल वहाँ पर 2018 के गणतंत्र दिवस और 2019 व 20 के गणतंत्र दिवस के मौकों पर नेताओं की पार्टिगत उपस्थिति से अवगत हो रहे हैं। उनके अबोध जीवन में भी राष्ट्रीयता के मामले में भी बँटे रहने का जहर जाने अनजाने घुलता जा रहा है। इस पर सभी दलों को मंथन करना होगा.. देश हित में.. आने वाली पीढ़ियों के हित में..। कि हम उन्हें क्या सौंपकर जा रहे हैं...। विचार करें...।


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