शैलेश तिवारी
नागरिकता संशोधन कानून जिसे लेकर पूरे देश सहित दुनियाँ में भी चर्चाएं सर्द मौसम को गरमा रही हैं। हालांकि इसमें एनआरसी और एनपीए को शामिल मानने या नहीं मानने को लेकर भी भ्रम है। बहरहाल इस कानून की व्याख्या भी सब अपने अपने तरीके से कर रहे है। सोच सबकी अलग-अलग लेकिन सच क्या है? इसको लेकर आम जनमानस में अभी भी भ्रम की स्थिति है।सीएए को लेकर जो विभिन्न कोण बने हैं हैं सिलसिलेवार उसको यहाँ उल्लेखित करते हैं और फैसला पाठकों पर छोड़ते हैं कि सच को वह खुद जाने।नागरिकता संशोधन कानून संसद में पारित हो जाने के बाद इसके समर्थन और विरोध दोनों के स्वर गूंजे। समर्थन पक्ष का कहना है कि विदेशी घुस्पेठियों को देश बाहर करने की दिशा में सही कदम है और इसे राष्ट्र भक्ति से जोड़ा जाकर मजबूत किया जा रहा है। विरोधी इसको संविधान का उल्लंघन बताकर न केवल प्रदर्शन कर रहे हैं वरन उच्चतम न्यायालय सहित कुछ उच्च न्यायालय में याचिका भी दर्ज कर चुके हैं। उन्हें इसके कियांवयन के लिए एन आर सी की प्रक्रिया जटिल और वर्ग विशेष के खिलाफ लग रही है।
ध्यान इसका भी दिया जाए कि विरोध के स्वर अधिकांशतः स्वस्फुर्त हैं तो समर्थन की रैलियों को प्रायोजित किया जा रहा है। और इन प्रायोजित रैलियों ने विरोध के स्वर और मुखर कर दिए।
राजनैतिक विश्लेषक इस कानून को भारत के संघीय ढांचे को टकराव के नजरिये से भी देख रहे हैं। खासकर जब केरल राज्य की विधानसभा ने इसको अपने राज्य में लागू नहीं करने का फैसला किया है। इसी तरह का फैसला और अन्य राज्य भी लेंगे। जिन राज्यों में भाजपा की सरकार नहीं हैं वहाँ पर भी इसको लागू करने से इंकार किया जाएगा। यह भी लगभग तय सा दिखाई दे रहा है। केंद्र और राज्य की यह टकराव की स्थिति देश को किस दिशा में ले जाएगी? यह भी एक विचारणीय बिंदु है।
दूसरा टकराव खुद एनडीए में भी दिखाई देने लगा है, जो इस समय केंद्र की सत्ता पर काबिज है। जैसे नितीश कुमार बिहार में, नवीन पटनायक उडीसा में लागू नही करने के संकेत दे चुके हैं। तो असम में अगप एन आर सी में चिंहित घुसपैठियों को बाहर निकलवाने की राह पर है तो भाजपा इनमें से हिंदुओं को नागरिकता देने की बात सीएए के तहत देने का रास्ता अख्तियार कर चुकी है। वहीं अकाली दल ने इसमें मुस्लिमों को शामिल किये जाने की मांग करते हुए दिल्ली विधानसभा चुनावों से दूरी बना ली है। टकराव की इन संभावनाओं से एन डी ए के पास खोने के सिवा कुछ और नहीं रह जाता है।
इसी तरह मालद्वीप , टर्की आदि भारत समर्थित देश जब इस कानून का विरोध दर्ज कराते हैं तब सरकार वजाए इन्हें सफाई देकर अपने पक्ष में बनाये रखने के, उल्टे उनसे व्यापारिक करारों को खत्म करने का निर्णय लेकर टकराव को पुख्ता कर देती है।
जानकारों और बुद्धिजीवियों की बात मानी जाए तो यह कानून अभी देश के लिए उतना जरूरी नहीं है कि उसमें पूरा देश बाँट दिया जाए। बल्कि इससे ज्यादा जरूरी था कि देश आर्थिक मंदी से निपटने के बारे में विचार करता। 45 सालों में अपने उच्चतम स्तर पर पहुंची बेरोजगारी से युवाओं को निकालने के प्रयास होते। बढ़ती महंगाई को काबू में लाने की कोशिशे की जाती। उद्योग धंधों को बंद होने से बचाते हुए नए उद्योग खोलने की दिशा में देश के कदम बढ़ते। देश नहीं बिकने दूंगा के गर्वीले नारे के नक्कारखाने में तूती की तरह सार्वजनिक उपक्रमों की बोली लगने की कवायद कर उन्हें बचाया जाता। ऐसे विशेषज्ञों का कहना है कि जन के मन को मूल मुद्दों से भटकाने का काम यह कानून कर रहा है।
इन बिदुओं के अलावा और भी बिंदु हो सकते हैं जिन पर विचार कर नागरिकों को सत्य जानने की कोशिश की जाना ज्यादा जरूरी है।


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