मैं जिम्मेदारी मे अब भी अव्वल


राजेश शर्मा 


बचपन से किशोर अवस्था पर पहला ही कदम रखा था तब पिताजी ने एक शब्द गले ऊतारा था "जिम्मेदारी"। मैं समझता-संभलता इससे पहले ही जवानी आ गई। फिर पहले कदम पर वही बात पिताजी ने दोहरायी "जिम्मेदारी"__

मैं समझ गया कि जिंदगी के अगले सभी मेच "जिम्मेदारी" के साथ खेलने होंगे। चुनावी दंगल मे भी उतरना होगा। बतौर मुफ्त सलाकार के रुप मे।
टीका-टिप्पणी की आदत तो बचपन से ही थी इसी हुनर को तमाम चुनावों मे अमलीजामा पहनाते आगे ऐसे बड़ता गया जैसे ओलम्पिक का पदक जीतने जा रहा हूँ। किसी को कवरेज से धूल चटाई तो किसी को अर्श पर पहुंचाने का दम हांसिल किया। बहुत सारे केंडीडेट जब खेत रहे तो दिक्कतें सामने आईं। मेरे तरफ आती घूरती नज़रों का सिर्फ़ मेने ही सामना किया। पिताजी का सबक "जिम्मेदारी" मन मे हमेशा सुतली बम बनकर फूटा और धमाकेदार आवाज निकली कि "मैं" लेता हूँ।

आज जब महारानी दिल्ली के चुनावी नतीजे सामने आए तो मेरे धेर्य ने कदापि जवाब नहीं दिया। हौसला बरकरार रहा। सभी के पराजयों की जिम्मेदारी लेकर मेने अपने पुश्तैनी अधिकार का म‍ान बढ़ाया। भाजपा के पराजय की जिम्मेदारी इसीलिए लेना मेरा नैतिक कर्तव्य बना कि मैं इस भागती जिंदगी के कारण दिल्ली पहुंच एक दिन भी प्रचार नहीं कर पाया। कांग्रेस के निल बटे सन्नाटे का भी मैं ही जिम्मेदार हूँ क्योंकि राहुल के जहन मे "जिम्मेदारी" का हुनर उतार नहीं पाया।

मेरे दो ट्रक बत्तियों से भरे धरे के धरे रह गए, क्योंकि भाजपा ने भाड़े को लेकर हामी नहीं भरी, नहीं तो जहां चाहते वहां बत्तियाँ दिलवाकर सीटों का स्कोर बड़वा सकते थे। मैं जिम्मेदारी के दलदल मे धंसा आज कईयों को भारमुक्त कर "अपने-आप" को गौरांवित महसूस कर रहा हूँ। चुनावों का देश है यह, यहां कल फिर मौका आएगा मैं फिरभी एक जिम्मेदार "अनेता" होने की हैसियत से अपनी "जिम्मेदारी" निभाऊंगा।

क्योंकि मैं समय हूँ ..

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