राजेश शर्मा 

वैश्विक महामारी इम्तिहान ले रही है। इसबार उसे "कोरोना" का नाम दिया गया है लेकिन महामारी का रोना या उसपर रोते रहना यह रोग पुराना है। हम आज रो रहे हैं। बच गए तो घरपर और नहीं बचे तो दो गज नसीब की जमीन पर। बुज़ुर्ग बताते हैं कि यह बिमारी तो सदियां काटकर आती ही रहती हैं। पूर्वकाल के दौरान हमारे बुजुर्गों ने लाल गेहूं की रोटी खाकर इसका सामना किया था।
कोरोना का ठीकरा किसी देश पर फोड़ना कहां तक उचित है। दोषारोपण तो कायरता की दहलीज़ का प्रथम श्रंगार है। हम कहां हैं !! यह देखना होगा। सोचना होगा नए सिरे से। संभलना होगा उच्चकोटि के तरीके से।
कहते हैं जनम,मरण,परण विधाता के हाथ मे तो फिर उसका कानून हम अपने हाथ मे लेकर क्यों चलते हैं।

अमीरों की अकड़ और गरीबों   की पकड़ दोनों ही एकसाथ रह रही है। "वाह" की चाह ने "आह" को लपेटा है। राज करने की नीति जब-जब भी समाजसेवा का चोला ओढ़ती है। जलाकर अपना ही घर हमे रोशनी करना पड़ती है। 

बात मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से सटे सीहोर जिले की है। जिले को चार विधायक और तीन सांसद मिले हुए हैं। वह भी नामी-गिरामी। कोई मुख्यमंत्री,कोई पूर्व राजस्वमंत्री,कोई धन्नासेठ,कोई विरासती सीट का मालिक, कोई मोदी का लाल, कोई गोदड़ी का लाल,"कोई बिना सहकार-नहीं उद्धार" का मारा, कोई केसरिया कलर से सुशोभित ....लेकिन सबके सब अब उस कठघरे मे हैं जहां से उनका निकलना बमुश्किल दिखाई देता है।

राजनीति भी क्या है एक तो बगैर देखे दिखाई देती है और दूसरी "दिखावा" नजर आती है। अभी कोरोना को लेकर जो चल रहा वह सिर्फ़ समाजसेवा के नाम पर दिखावे की राजनीति है। विधायक,सांसद गहरी नींद मे हैं। कथित समर्थक निद्रा तोड़ते हैं। सराय मे नोटंकी होती फिर नेताजी लेट जाते हैं ।
किसी को दाना-पानी मुहैया कराना ही खास नहीं बल्कि उसके इस संकट मे खड़े होना खास है। 33 दिन से घर बैठे परिवार से पूछिए भी कि सेनेटाइजर,साबून,मास्क,ब्रश,पेस्ट,बिजली के बिल, गैस सिलेंडर, और ....वगैरह-वगैरह कहां से और कैसे आ रहे हैं। जब चुनाव हुआ था तब तो आपने करोड़ों रुपये की शराब पानी की तरह बहाई थी। महिलाओं के पैरों को बिछुड़ियों से सुशोभित किया था। कहीं कंगने पहुंचाए थे, सात अलग-अलग  रंगों के लिफाफे और उनमे रखा वजन किसी से छिपा है क्या!! वह रातों-रात के जमीनी पट्टे, वह ""मानदेय"" पर रखे गए मूँछतंडे कहां हैं सब___कहां हैं वह हथकंडे?

दाई से पेट नहीं छिपता। वक्त है उजड़ते घरों मे बहार लाने का और इसके लिए बाहर आना होगा। कोरोना से मरने का ठेका__पुलिस,डाक्टर,प्रशासन,सफाई कर्मचारियों या मीडियाकर्मीयों का ही नहीं है।वोट लेकर ओहदे पर हो कोई कांम्पटीशन ऐग्जाम फेस करके नहीं, माइक पर चौकीदार बताने से और जनता को मूर्ख बनाते  रहने से नैया बार-बार पार नहीं लगती। चौकीदारी करना होगी कोरोना के इस दौर मे। किसकी !! वहीं की___ जहा इस दौर मे कोई आता-जाता नहीं।

बुद्ध जंगल मे जा रहे थे। एक रास्ते की ओर जा रहे थे तो ग्रामीणों ने रोका__उधर अंगुलिमाल रहता है, जो उधर जाता है उसका सिर काटकर अंगुलियों की माला पहन लेता है।
बुद्ध नहीं रुके बढ़ते गए तो अंगुलिमाल मिला। उसने कहा- सामने के पेड़ से एक पत्ती तोड़कर ला दे। यह भी कोई अंतिम इच्छा है, जो सिर तोड़ता है उससे यह भिक्षु पत्ती तोड़ने का कह रहा है।
बुरा तो लगा लेकिन अंतिम इच्छा पूरी करने का वचन था सो तोड़ लाया।---बुद्ध ने  कहा अब फिरसे उसी पेड़ मे जोड़ आ। ऐसा कहीं होता है ? अंगुलिमाल से बुद्ध ने कहा--जिसे तुम जोड़ नहीं सकते उसे तुम्हें तोड़ने का अधिकार भी नहीं है। जिसे तुम जीवित नहीं कर सकते उसे मारने का अधिकार भी तुम्हें नहीं है।अंगुलिमाल को अक्ल आई और वह हत्यारे से भिक्षु बन गया। 
कागज काले करने वाले आदतन अपराधियों की कुछेक पंक्तियाँ यदि कोरोना  के इस दौर मे कुछ काम आ जाएं और यह सब हकीकत मे चौकीदार हो जाएं तो क्या बात है। दरअसल यह डकैत से भिक्षु हो जाने का वक्त है। 
राजनीति करने का नहीं।
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