लेखक
माँ मेरी पेंटिंग, कम्पिटीशन में पहले नम्बर पर आयी है।" अनु घर लौटते ही खुशी से माँ के गले लग गयी। नीमा ने भी "मेरी प्यारी बिटिया" कह कर उसको गले लगा लिया।
मैं भी अपनी किताबों की दुनिया से बाहर निकल आया, "मुबारक हो बिटिया, कहाँ है पेंटिग, हम भी देखें जरा।"
"पेंटिंग तो पापा प्रदर्शनी में रखी गई है। पर उसका फोटो है मेरे पास।" अनु अपने मोबाइल पर दिखाती हुई बोली।
श्वेत श्याम रंग में पेंटिंग वाकई सुन्दर बनी थी। जेलनुमा कोठरी में सलाखों के पीछे एक युवती निराश सहमी सी बैठी हुयी थी। उसके पैरो में बेड़ियाँ पडी हुयी थीं।
"बहुत सुन्दर अनु। पर . . . . !" मैंने कुछ कहना चाहा।
"पर क्या पापा?" अनु की आँखों में प्रश्न उभर आया।
"जेल के नजरिये से तो ठीक है ये लेकिन आज के समाज में ऐसा कहाँ होता है?" मैं कुछ दार्शनिकता दिखाने लगा, "आज की नारी तो घर से निकलकर नित नयी ऊँचाइयाँ छू रही है। फिर उसके पाँव में ये जंजीर, ये बेडि़याँ. . . ।"
"आप सही कह रहे हैं पापा! पर. . ." मेरी बात बीच में काट कर जवाब देती अनु पहले कुछ झिझकी, फिर मेरी आँखों में आँखें डाल कर बोली, ". . बेड़ियाँ तो हर नारी के पाँव में बचपन से ही पड़ जाती हैं मगर आसानी से नजर नहीं आतीं।"
"पर हमने तो तुम्हारे पाँव में ऐसी कोई बेड़ी नहीं डाली थी न।" माँ ने कहा।
"यहाँ मत बैठो, वहाँ मत खड़ी रहो, ये मत पहनो, उसे मत देखो, इससे बात मत करो, कालेज ट्रिप पर जाने की कोई जरूरत नहीं, रात को अकेले बाहर मत जाओ! ये सब भी तो दिखाई न देने वाली बेड़ियाँ ही हैं न माँ।"
हम दोनों के पास बेटी की बात का कोई जवाब नहीं था, वह सही ही तो कह रही थी। ऐसा लगा जैसे उस पेंटिंग में अनु ही बैठी है।
विरेंदर ‘वीर’ मेहता (विरेंदर कुमार मेहता) लक्ष्मी नगर, दिल्ली में निवासरत हैं। एक निजी कंपनी में लेखाकार/कनिष्ठ प्रबंधक के तौर पर कार्यरत होने के साथ साहित्य सेवा भी कर रहे हैं। लघुकथा, कहानी, आलेख, समीक्षा, गीत-नवगीत आदि का लेखन करते है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं के प्रकाशन के अलावा लगभग 20 संकलनों में भागीदारी रही है। आपने भाषा सहोदरी लघुकथा 2017 (भाषा सहोदरी) एवं लघुकथा मंजूषा 3 2019 (वर्जिन साहित्यपीठ) का सह संपादन भी किया है। आपको साहित्य के क्षेत्र में विभिन्न सम्मानों से सम्मानित भी किया जा चुका है।
संपादक
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नारी.. दुनिया की आधी आबादी... कहने को आज पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर.. वह भी करने लगी हैं... जो कभी पुरुष का एकाधिकार माना जाता था...। लेखक की लघु कथा " बेड़ियाँ" में यह बात रेखांकित भी की गई है...। लेकिन ये न करो, वहाँ न जाओ, ये मत पहनो आदि आदि.. अनेक वर्जनाएँ आज भी... "अनु" जैसी बालिकाओं पर लागू हैं... । ऐसी ही जंजीरों का उल्लेख कथानक में खूबसूरती के साथ किया है....। समय जरूर बदला है.... लेकिन नारी की स्थिति में वह... बदलाव नहीं आया... जिसकी वह हकदार है..। बंदिशे लगाने वाले माँ बाप भी गलत नहीं कह जा सकते.... वजह भी है.... निर्भया जैसे दर्दनाक घटनाक्रम... उसको प्रेरित करते हैं.. अनु को बेड़ियों में बांधने की...। त्रेता की अहिल्या हो या द्वापर की वह सोलह हजार एक सौ स्त्रियाँ... जो खुद का कोई दोष नहीं होते हुए भी.... समाज द्वारा स्वीकृत नहीं की गई...। उन युगो में तो क्रमशः राम और कृष्ण ने.... उनका उद्धार अपने अपने ढंग से कर दिया... लेकिन जिस युग में हम.. सांस ले रहे हैं.. उस काल खंड में ... जिसे बहुत उन्नत माना जाता है.... अहिल्या की तरह की स्थिति वाली या द्वापर की नारियों की तरह... बहिष्कृत सा व्यवहार ही किया जाता है..। तब बेड़ियाँ जैसे कथानक... रचे जाते हैं...। जो युग परिवर्तन के बाद भी.... मानसिकता के बदलाव की अपेक्षा कर रहे हैं...। शब्दों की गागर में... अर्थों का सागर... समेट लेने की कुशलता... कथाकार की कलम... के कौशल का परिचायक है..। बधाई विरेंद्र जी...।
शैलेश तिवारी, संपादक
बेड़ियाँ
माँ मेरी पेंटिंग, कम्पिटीशन में पहले नम्बर पर आयी है।" अनु घर लौटते ही खुशी से माँ के गले लग गयी। नीमा ने भी "मेरी प्यारी बिटिया" कह कर उसको गले लगा लिया।
मैं भी अपनी किताबों की दुनिया से बाहर निकल आया, "मुबारक हो बिटिया, कहाँ है पेंटिग, हम भी देखें जरा।"
"पेंटिंग तो पापा प्रदर्शनी में रखी गई है। पर उसका फोटो है मेरे पास।" अनु अपने मोबाइल पर दिखाती हुई बोली।
श्वेत श्याम रंग में पेंटिंग वाकई सुन्दर बनी थी। जेलनुमा कोठरी में सलाखों के पीछे एक युवती निराश सहमी सी बैठी हुयी थी। उसके पैरो में बेड़ियाँ पडी हुयी थीं।
"बहुत सुन्दर अनु। पर . . . . !" मैंने कुछ कहना चाहा।
"पर क्या पापा?" अनु की आँखों में प्रश्न उभर आया।
"जेल के नजरिये से तो ठीक है ये लेकिन आज के समाज में ऐसा कहाँ होता है?" मैं कुछ दार्शनिकता दिखाने लगा, "आज की नारी तो घर से निकलकर नित नयी ऊँचाइयाँ छू रही है। फिर उसके पाँव में ये जंजीर, ये बेडि़याँ. . . ।"
"आप सही कह रहे हैं पापा! पर. . ." मेरी बात बीच में काट कर जवाब देती अनु पहले कुछ झिझकी, फिर मेरी आँखों में आँखें डाल कर बोली, ". . बेड़ियाँ तो हर नारी के पाँव में बचपन से ही पड़ जाती हैं मगर आसानी से नजर नहीं आतीं।"
"पर हमने तो तुम्हारे पाँव में ऐसी कोई बेड़ी नहीं डाली थी न।" माँ ने कहा।
"यहाँ मत बैठो, वहाँ मत खड़ी रहो, ये मत पहनो, उसे मत देखो, इससे बात मत करो, कालेज ट्रिप पर जाने की कोई जरूरत नहीं, रात को अकेले बाहर मत जाओ! ये सब भी तो दिखाई न देने वाली बेड़ियाँ ही हैं न माँ।"
हम दोनों के पास बेटी की बात का कोई जवाब नहीं था, वह सही ही तो कह रही थी। ऐसा लगा जैसे उस पेंटिंग में अनु ही बैठी है।
विरेंदर 'वीर' मेहतादिल्ली
------------------परिचय
विरेंदर ‘वीर’ मेहता (विरेंदर कुमार मेहता) लक्ष्मी नगर, दिल्ली में निवासरत हैं। एक निजी कंपनी में लेखाकार/कनिष्ठ प्रबंधक के तौर पर कार्यरत होने के साथ साहित्य सेवा भी कर रहे हैं। लघुकथा, कहानी, आलेख, समीक्षा, गीत-नवगीत आदि का लेखन करते है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं के प्रकाशन के अलावा लगभग 20 संकलनों में भागीदारी रही है। आपने भाषा सहोदरी लघुकथा 2017 (भाषा सहोदरी) एवं लघुकथा मंजूषा 3 2019 (वर्जिन साहित्यपीठ) का सह संपादन भी किया है। आपको साहित्य के क्षेत्र में विभिन्न सम्मानों से सम्मानित भी किया जा चुका है।
संपादक
------------------
समीक्षा
नारी.. दुनिया की आधी आबादी... कहने को आज पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर.. वह भी करने लगी हैं... जो कभी पुरुष का एकाधिकार माना जाता था...। लेखक की लघु कथा " बेड़ियाँ" में यह बात रेखांकित भी की गई है...। लेकिन ये न करो, वहाँ न जाओ, ये मत पहनो आदि आदि.. अनेक वर्जनाएँ आज भी... "अनु" जैसी बालिकाओं पर लागू हैं... । ऐसी ही जंजीरों का उल्लेख कथानक में खूबसूरती के साथ किया है....। समय जरूर बदला है.... लेकिन नारी की स्थिति में वह... बदलाव नहीं आया... जिसकी वह हकदार है..। बंदिशे लगाने वाले माँ बाप भी गलत नहीं कह जा सकते.... वजह भी है.... निर्भया जैसे दर्दनाक घटनाक्रम... उसको प्रेरित करते हैं.. अनु को बेड़ियों में बांधने की...। त्रेता की अहिल्या हो या द्वापर की वह सोलह हजार एक सौ स्त्रियाँ... जो खुद का कोई दोष नहीं होते हुए भी.... समाज द्वारा स्वीकृत नहीं की गई...। उन युगो में तो क्रमशः राम और कृष्ण ने.... उनका उद्धार अपने अपने ढंग से कर दिया... लेकिन जिस युग में हम.. सांस ले रहे हैं.. उस काल खंड में ... जिसे बहुत उन्नत माना जाता है.... अहिल्या की तरह की स्थिति वाली या द्वापर की नारियों की तरह... बहिष्कृत सा व्यवहार ही किया जाता है..। तब बेड़ियाँ जैसे कथानक... रचे जाते हैं...। जो युग परिवर्तन के बाद भी.... मानसिकता के बदलाव की अपेक्षा कर रहे हैं...। शब्दों की गागर में... अर्थों का सागर... समेट लेने की कुशलता... कथाकार की कलम... के कौशल का परिचायक है..। बधाई विरेंद्र जी...।
शैलेश तिवारी, संपादक


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