लोकतंत्र की लूट को.... बचा सको तो बचा लो
लेखक
हमारे देश में हर कोई लोकतंत्र बचाने की बात करता है लेकिन इसे लूट कौन रहा है? हर कोई इसका पहरेदार होने का दावा करता है। परंतु इसको लूटा किसने? दरअसल इसकी लूट पुरानी है डेमोक्रेसी में हम चुनते तो नेता है लेकिन वह बनता राजा है और यही से शुरू होता है लूट का सिलसिला। जिसको सत्ता मिली उसी ने जम्हूरियत को लूटा। आज इसका रूप और ज्यादा विकृत हो चुका है। लोकतंत्र जो देश का सबसे सुंदर गहना था, दुनियाँ में सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में पहचाना जाता रहा। वही लोकतंत्र वर्तमान में कई जगह से दरक कर बिखरने लगा है। जिन्होंने इसे बनाया इसको बचाने की जिम्मेदारी भी उन्हीं कंधो पर है यानी हम भारतवासियों पर।
लोकतंत्र में व्याप्त अव्यवस्थाओं को खोजकर उनमें सुधार की शुरुआत करने के लिए निः संदेह हम में से ही किसी को आगे आना होगा। यही आज के समय की मांग ही है और पुकार भी। इस लोकतांत्रिक सुंदर इमारत को इसके वास्तविक आकार में लाना हमारी ही जिम्मेदारी है।
लोकतंत्र, डेमोक्रेसी या फिर जम्हूरियत कह लें। भारत एक प्रजातांत्रिक देश है। राजनैतिक गलियारों में एक बात की बहुत तेज चर्चा है कि देश में लोकतंत्र को खत्म किया जा रहा है। केन्द्र में वर्तमान में काबिज भारतीय जनता पार्टी की सरकार षडयंत्र कर राज्यों में चुनी हुई सरकारों को गिराने के प्रयास कर रही है। ऐसा आरोप आज कल विपक्षी दल लगाते हैं। अरुणाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, कर्नाटक, मध्यप्रदेश इसके जीते जागते उदाहरण हैं और अब राजस्थान में कांग्रेस सरकार को विधायकों की खरीद फरोख्त, षडयंत्र और सरकारी मशीनरी के दम पर अस्थिर कर उसे गिराने के प्रयास तेज गति से किये जा रहे हैं।
यदि ऐसा है तो यह बात वाकई में बेहद चिंताजनक है। एक आम व्यक्ति जो घंटे लाईन में खड़े होकर अपना मन पसंद उम्मीदवार चुनता है । उसी मतदाता के साथ छल, मतलब जनता के साथ यह विश्वासघात और धोखा है।
हम सबने देखा कि जब फरवरी- मार्च माह में कोरोना संक्रमण के मामले आने शुरू हुए थे तब विश्व स्वास्थ्य संगठन की चेतावनी को नकारते हुए केन्द्र सरकार नमस्ते ट्रंप में व्यस्त रही। गुजरात की गरीबी को दीवार में चुनवा दिया गया। उसके बाद मध्यप्रदेश में चुनी हुई कांग्रेस सरकार को गिराने की तैयारियों में लगी रही। अपने मकसद को पूरा करने में कामयाब भी रही।
अभी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खुद कोरोना संक्रमित हैं जो विपक्ष में रहते वक्त तक कोरोना को साधारण सर्दी- जुकाम बताया करते थे। आपदा के समय में जब जनता को कोरोना से बचाना था तब मप्र में चुनी हुई सरकार गिराई गई। सत्ता हासिल करने के लिए भाजपा यही घटनाक्रम अब राजस्थान में भी दोहराना चाहती है।
विधायक आए दिन पाला बदल रहे हैं कांग्रेस से भाजपा। ऐसा क्या हुआ कि कल तक भाजपा को कोसने वाले आज उसी की गोद में बैठ गए। इसे विचारधारा की लडाई तो नहीं कह सकते। यह तो लालच है सत्ता का। ताकत का, रूपयो का और पद का। या फिर डर है कि जो राजनीति में रहते हुए उन्होंने जो अकूत संपत्ती बनाई है कहीं उस पर सत्ताधारी दल छापे पड़वा कर न
छीन लें। सरकारी संस्थाओं की मशीनरी का इस्तेमाल कर उसे जेल कर पहुंचा दें।
वैसे लोकतंत्र की दुहाई देने वाली कांग्रेस में लोकतांत्रिक मूल्यों को कितनी तवज्जों दी जाती है यह आप भी जानते हैं। यहां हर बात गांधी परिवार से शुरू होती है और यहीं पर आकर खत्म हो जाती है। आज गांधी परिवार के तीन मेंबर कांग्रेस के शीर्ष पद पर आसीन हैं। क्या यहां कोई अन्य युवा भी इतनी ही आसानी से कांग्रेस में यह पद प्राप्त कर सकता है। वंशवाद से बाहर निकलकर ये देखना ही नही चाहते।
इस राजनीतिक लालच के खेल में जनता कहां खडी है जो इन्हें चुनकर नेता बनाती है।
इस देश में धीरे धीरे लोकतंत्र खत्म हो रहा है क्या यह बात जनता जानती है ?
लोकतंत्र क्या है और इसे बचाने की क्या शर्ते होना चाहिए और क्या इस देश में संपूर्ण लोकतंत्र लागू हो चुका है ?
सरल शब्दों में कहले तो लोकतंत्र का मतलब होता है जनता का शासन। अब यह बात पढ़ कर आप एक बार तो जरूर हंस लेंगे। कहीं लगता है ऐसा कि जनता का शासन है।
हम नेता चुनते हैं और वह शासक बन जाता है राजा बन बैठता है। आप पर हुकुमत करता है और आप पर ही डंडे चलवाता है।
गरीब की बात करते करते इस देश में नेता अमीर हो जाते हैं। कैसे ?
जब जनता का शासन है तो सभी संसाधनों और व्यवस्थाओं पर नेता, जनता, उद्योगपति सबका समान अधिकार होना चाहिए।
अमीर हो या फिर गरीब सभी को एक जैसी सुविधाएं मिलना चाहिए। देश के हर एक बच्चें को समान शिक्षा, आगे बढने के समान अवसर क्यो नहीं।
हर एक को समान स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध होना चाहिए।
शनिवार को खबर आई कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कोरोना संक्रमित हो गए हैं। रविवार को एक तस्वीर फिर आई जिसमें एक निजी अस्पताल में भर्ती सीएम शिवराज टीवी पर पीएम मोदी का कार्यक्रम मन की बात सुन रहे हैं।
चौहान निश्चित ही स्वस्थ्य होंगे क्योकि उन्हें वह सब सुविधाएं उपलब्ध हो रही है जो एक संक्रमित व्यक्ति के सुधार के लिए आवश्यक हैं। क्या ये सारी सुविधाए मप्र में हर एक कोरोना संक्रमित मरीज को मिल रही हैं। ये भी लोकतंत्र की लूट का एक छोटा सा नमूना कहा जा सकता है।
ये असमानता आखिर क्यो है, जब देश में डेमोक्रेसी जिंदा है तो सभी को एक जैसा उपचार और सुविधाएं मिलना चाहिए।
कोविड केयर सेंटरों का हाल किसी
से छिपा नहीं हैं। यहां पर पीने को साफ पानी तक नहीं होता। शायद इसलिए ही सीएम संक्रमित होने पर किसी सरकारी कोविड केयर सेंटर में भर्ती नहीं हुए। उन्होंने अपने उपचार के लिए निजी अस्पताल चुना।
चूंकि वह अब खुद संक्रमित हैं तो उन्हें अपने प्रदेश में अन्य मरीजों के बारे में भी सोचना चाहिए कि जिला स्थित कोविड केयर सेंटरों में संक्रमितों को क्या सुविधाएं मिल रही हैं। इन सेंटरों में वेंटिलेटर और आक्सीजन की क्या उपलब्धता है। इन्हें अधिकारियों से इस बात का फालोअप लेना चाहिए कि कंटेंमेंट एरियाओं में कोई भूखा तो नहीं सो रहा। तभी सच्चा लोकतंत्र स्थापित होगा। इसके लिए जनता को भी अपने रहनुमाओं का पल्ला छोड़कर खुद लोकतंत्र को बचाने सड़कों पर आना पड़ सकता है। अन्यथा आने वाले समय में किस्से सुनाना, हमारे जमाने में चुनाव होते थे?
लेखक
हमारे देश में हर कोई लोकतंत्र बचाने की बात करता है लेकिन इसे लूट कौन रहा है? हर कोई इसका पहरेदार होने का दावा करता है। परंतु इसको लूटा किसने? दरअसल इसकी लूट पुरानी है डेमोक्रेसी में हम चुनते तो नेता है लेकिन वह बनता राजा है और यही से शुरू होता है लूट का सिलसिला। जिसको सत्ता मिली उसी ने जम्हूरियत को लूटा। आज इसका रूप और ज्यादा विकृत हो चुका है। लोकतंत्र जो देश का सबसे सुंदर गहना था, दुनियाँ में सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में पहचाना जाता रहा। वही लोकतंत्र वर्तमान में कई जगह से दरक कर बिखरने लगा है। जिन्होंने इसे बनाया इसको बचाने की जिम्मेदारी भी उन्हीं कंधो पर है यानी हम भारतवासियों पर।
लोकतंत्र में व्याप्त अव्यवस्थाओं को खोजकर उनमें सुधार की शुरुआत करने के लिए निः संदेह हम में से ही किसी को आगे आना होगा। यही आज के समय की मांग ही है और पुकार भी। इस लोकतांत्रिक सुंदर इमारत को इसके वास्तविक आकार में लाना हमारी ही जिम्मेदारी है।
लोकतंत्र, डेमोक्रेसी या फिर जम्हूरियत कह लें। भारत एक प्रजातांत्रिक देश है। राजनैतिक गलियारों में एक बात की बहुत तेज चर्चा है कि देश में लोकतंत्र को खत्म किया जा रहा है। केन्द्र में वर्तमान में काबिज भारतीय जनता पार्टी की सरकार षडयंत्र कर राज्यों में चुनी हुई सरकारों को गिराने के प्रयास कर रही है। ऐसा आरोप आज कल विपक्षी दल लगाते हैं। अरुणाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, कर्नाटक, मध्यप्रदेश इसके जीते जागते उदाहरण हैं और अब राजस्थान में कांग्रेस सरकार को विधायकों की खरीद फरोख्त, षडयंत्र और सरकारी मशीनरी के दम पर अस्थिर कर उसे गिराने के प्रयास तेज गति से किये जा रहे हैं।
यदि ऐसा है तो यह बात वाकई में बेहद चिंताजनक है। एक आम व्यक्ति जो घंटे लाईन में खड़े होकर अपना मन पसंद उम्मीदवार चुनता है । उसी मतदाता के साथ छल, मतलब जनता के साथ यह विश्वासघात और धोखा है।
हम सबने देखा कि जब फरवरी- मार्च माह में कोरोना संक्रमण के मामले आने शुरू हुए थे तब विश्व स्वास्थ्य संगठन की चेतावनी को नकारते हुए केन्द्र सरकार नमस्ते ट्रंप में व्यस्त रही। गुजरात की गरीबी को दीवार में चुनवा दिया गया। उसके बाद मध्यप्रदेश में चुनी हुई कांग्रेस सरकार को गिराने की तैयारियों में लगी रही। अपने मकसद को पूरा करने में कामयाब भी रही।
अभी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खुद कोरोना संक्रमित हैं जो विपक्ष में रहते वक्त तक कोरोना को साधारण सर्दी- जुकाम बताया करते थे। आपदा के समय में जब जनता को कोरोना से बचाना था तब मप्र में चुनी हुई सरकार गिराई गई। सत्ता हासिल करने के लिए भाजपा यही घटनाक्रम अब राजस्थान में भी दोहराना चाहती है।
विधायक आए दिन पाला बदल रहे हैं कांग्रेस से भाजपा। ऐसा क्या हुआ कि कल तक भाजपा को कोसने वाले आज उसी की गोद में बैठ गए। इसे विचारधारा की लडाई तो नहीं कह सकते। यह तो लालच है सत्ता का। ताकत का, रूपयो का और पद का। या फिर डर है कि जो राजनीति में रहते हुए उन्होंने जो अकूत संपत्ती बनाई है कहीं उस पर सत्ताधारी दल छापे पड़वा कर न
छीन लें। सरकारी संस्थाओं की मशीनरी का इस्तेमाल कर उसे जेल कर पहुंचा दें।
वैसे लोकतंत्र की दुहाई देने वाली कांग्रेस में लोकतांत्रिक मूल्यों को कितनी तवज्जों दी जाती है यह आप भी जानते हैं। यहां हर बात गांधी परिवार से शुरू होती है और यहीं पर आकर खत्म हो जाती है। आज गांधी परिवार के तीन मेंबर कांग्रेस के शीर्ष पद पर आसीन हैं। क्या यहां कोई अन्य युवा भी इतनी ही आसानी से कांग्रेस में यह पद प्राप्त कर सकता है। वंशवाद से बाहर निकलकर ये देखना ही नही चाहते।
इस राजनीतिक लालच के खेल में जनता कहां खडी है जो इन्हें चुनकर नेता बनाती है।
इस देश में धीरे धीरे लोकतंत्र खत्म हो रहा है क्या यह बात जनता जानती है ?
लोकतंत्र क्या है और इसे बचाने की क्या शर्ते होना चाहिए और क्या इस देश में संपूर्ण लोकतंत्र लागू हो चुका है ?
सरल शब्दों में कहले तो लोकतंत्र का मतलब होता है जनता का शासन। अब यह बात पढ़ कर आप एक बार तो जरूर हंस लेंगे। कहीं लगता है ऐसा कि जनता का शासन है।
हम नेता चुनते हैं और वह शासक बन जाता है राजा बन बैठता है। आप पर हुकुमत करता है और आप पर ही डंडे चलवाता है।
गरीब की बात करते करते इस देश में नेता अमीर हो जाते हैं। कैसे ?
जब जनता का शासन है तो सभी संसाधनों और व्यवस्थाओं पर नेता, जनता, उद्योगपति सबका समान अधिकार होना चाहिए।
अमीर हो या फिर गरीब सभी को एक जैसी सुविधाएं मिलना चाहिए। देश के हर एक बच्चें को समान शिक्षा, आगे बढने के समान अवसर क्यो नहीं।
हर एक को समान स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध होना चाहिए।
शनिवार को खबर आई कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कोरोना संक्रमित हो गए हैं। रविवार को एक तस्वीर फिर आई जिसमें एक निजी अस्पताल में भर्ती सीएम शिवराज टीवी पर पीएम मोदी का कार्यक्रम मन की बात सुन रहे हैं।
चौहान निश्चित ही स्वस्थ्य होंगे क्योकि उन्हें वह सब सुविधाएं उपलब्ध हो रही है जो एक संक्रमित व्यक्ति के सुधार के लिए आवश्यक हैं। क्या ये सारी सुविधाए मप्र में हर एक कोरोना संक्रमित मरीज को मिल रही हैं। ये भी लोकतंत्र की लूट का एक छोटा सा नमूना कहा जा सकता है।
ये असमानता आखिर क्यो है, जब देश में डेमोक्रेसी जिंदा है तो सभी को एक जैसा उपचार और सुविधाएं मिलना चाहिए।
कोविड केयर सेंटरों का हाल किसी
से छिपा नहीं हैं। यहां पर पीने को साफ पानी तक नहीं होता। शायद इसलिए ही सीएम संक्रमित होने पर किसी सरकारी कोविड केयर सेंटर में भर्ती नहीं हुए। उन्होंने अपने उपचार के लिए निजी अस्पताल चुना।
चूंकि वह अब खुद संक्रमित हैं तो उन्हें अपने प्रदेश में अन्य मरीजों के बारे में भी सोचना चाहिए कि जिला स्थित कोविड केयर सेंटरों में संक्रमितों को क्या सुविधाएं मिल रही हैं। इन सेंटरों में वेंटिलेटर और आक्सीजन की क्या उपलब्धता है। इन्हें अधिकारियों से इस बात का फालोअप लेना चाहिए कि कंटेंमेंट एरियाओं में कोई भूखा तो नहीं सो रहा। तभी सच्चा लोकतंत्र स्थापित होगा। इसके लिए जनता को भी अपने रहनुमाओं का पल्ला छोड़कर खुद लोकतंत्र को बचाने सड़कों पर आना पड़ सकता है। अन्यथा आने वाले समय में किस्से सुनाना, हमारे जमाने में चुनाव होते थे?


Post A Comment: