हद कर दी आपने...
लेखक
वैसे वह तीन थे और अपराधियों के अभ्यारण में विचरण कर रहे थे। चूकि अभ्यारण में होने से उन्हे किसी का खौफ नही था पर हायरी किस्मत कुछ भेदियों ने बाजी मार ली और तीनों के साथ आखिरकार पकडा पाटी खेलनी पड़ी। दो तो होशियार थे, जो मौका देखकर खिसक गए, रह गया एक और उसे दबोचना मजबूरी थी, तो वह पकड़ा गए। दो-चार दिन की मेहमानी के बाद जो सदव्यवहार हुआ, उससे विश्वास बड़ा और इसी के सहारे वह पानी पीने का कहकर ऐसा गया कि साहब का कंठ सूखने लगा। दो तो पहले ही चकमा देकर निकल गए, यह एक हत्थे चड़ा था। तो वह भी भाग निकला। बस फिर क्या था आगे आगे चोर और पीछे-पीछे.....? कोई 200 मीटर की रेस के बाद जंगल में मंगल कर रहे लोगो ने यह दौड देखी तो वे समझे की कयामत आ गई। तो सबके सब अपने ताश पत्ते और गांधी छाप छोड कर खडे हो गए। पर उन्हे क्या पता था कि जिनकों वे कयामत समझ रहे हैं उनपर ही कयामत आ गई हैं। लगे पुकारने अरे हम तुमकों नही उसकों.... हां .... उसकों पकडों, उन्होने उसकों पकड लिया। इसीके साथ जंगल में मंगल कर रहे लोगो की और साहब की कयामत टल गई। साहब ने कहा इस पकड़ा पाटी में सांस फूल गई, बहुत साल बाद दौडे और अब सुस्ताले। समीप ही खडे एक अधिनस्थ ने नसीहत दी, साहब सुस्ता तो बाद में लेगे। पहले इसे ताले (लाकप) में करो। यह लाखों का एक हैं (यहा आपकों लगेगा कि का के स्थान पर में होना चाहिए था पर का का ही उपयोग किया हैं, फिर से बांचे) इस बार गुम गया और नही मिला तो मुश्किल होगी। साहब को बात जच गई, तभी एक ने कहा जाएगा कहा चौपहिया भी तो हमारे कब्जे में हैं। इतने में एक जानकार ने कहा वह तो दो के जाने के बाद ही चली गई, तो फिर क्या? क्या नही यह भी तो लाखों का एक हैं। अब यह किस्सा धीरे-धीरे आम हो गया। सुनने वाले कह रहे हैं कि हद कर दी आपने...।
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आप जिले के वरिष्ठ पत्रकार हैं और अपनी धारदार लेखनी के लिए एक विशिष्ट पहचान रखते हैं।
लेखक
वैसे वह तीन थे और अपराधियों के अभ्यारण में विचरण कर रहे थे। चूकि अभ्यारण में होने से उन्हे किसी का खौफ नही था पर हायरी किस्मत कुछ भेदियों ने बाजी मार ली और तीनों के साथ आखिरकार पकडा पाटी खेलनी पड़ी। दो तो होशियार थे, जो मौका देखकर खिसक गए, रह गया एक और उसे दबोचना मजबूरी थी, तो वह पकड़ा गए। दो-चार दिन की मेहमानी के बाद जो सदव्यवहार हुआ, उससे विश्वास बड़ा और इसी के सहारे वह पानी पीने का कहकर ऐसा गया कि साहब का कंठ सूखने लगा। दो तो पहले ही चकमा देकर निकल गए, यह एक हत्थे चड़ा था। तो वह भी भाग निकला। बस फिर क्या था आगे आगे चोर और पीछे-पीछे.....? कोई 200 मीटर की रेस के बाद जंगल में मंगल कर रहे लोगो ने यह दौड देखी तो वे समझे की कयामत आ गई। तो सबके सब अपने ताश पत्ते और गांधी छाप छोड कर खडे हो गए। पर उन्हे क्या पता था कि जिनकों वे कयामत समझ रहे हैं उनपर ही कयामत आ गई हैं। लगे पुकारने अरे हम तुमकों नही उसकों.... हां .... उसकों पकडों, उन्होने उसकों पकड लिया। इसीके साथ जंगल में मंगल कर रहे लोगो की और साहब की कयामत टल गई। साहब ने कहा इस पकड़ा पाटी में सांस फूल गई, बहुत साल बाद दौडे और अब सुस्ताले। समीप ही खडे एक अधिनस्थ ने नसीहत दी, साहब सुस्ता तो बाद में लेगे। पहले इसे ताले (लाकप) में करो। यह लाखों का एक हैं (यहा आपकों लगेगा कि का के स्थान पर में होना चाहिए था पर का का ही उपयोग किया हैं, फिर से बांचे) इस बार गुम गया और नही मिला तो मुश्किल होगी। साहब को बात जच गई, तभी एक ने कहा जाएगा कहा चौपहिया भी तो हमारे कब्जे में हैं। इतने में एक जानकार ने कहा वह तो दो के जाने के बाद ही चली गई, तो फिर क्या? क्या नही यह भी तो लाखों का एक हैं। अब यह किस्सा धीरे-धीरे आम हो गया। सुनने वाले कह रहे हैं कि हद कर दी आपने...।
सुधीर पाठक, आष्टा
----------------------आप जिले के वरिष्ठ पत्रकार हैं और अपनी धारदार लेखनी के लिए एक विशिष्ट पहचान रखते हैं।


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