सुबह-सुबह जब सैर पे जाऊँ.... 


राजेश शर्मा 


सूरज की लालिमा का प्रकाश दिल-ओ-दिमाग पर दस्तक दे रहा था _सुबह सुबह सूरज की पहली किरण प्रकृति को अपनी स्वर्णमयी आभा से आलोकित कर रही थी--सोचा मार्निंग वाक पर आज थाने  की तरफ निकल जाऊं। देखें क्या चल रहा है "देशभक्ति और जनसेवा" केंद्र पर....!

हालांकि आसमान पर बादल थे, इछावर थाने के सामने एक गुमटीनुमा होटल खुली थी,वहां सिर्फ़ पुलिस वालों का जमावड़ा था। आंतरिक सुरक्षा के प्रहरियों के बीच फरियादियों के बारे मे चाय की चुस्कियों के साथ जिक्र था। गालियों का इस्तेमाल तो ऐसे चल रहा था जैसे AK-47 रायफल चल रही हो, मेरा भी भेष बदला हुआ था न सिर पर वह आर्मी वाली केप और न ही जींस-टी शर्ट। फुल देहाती नजर आ रहा था।
वह मुझे समझ नहीं पा रहे थे लेकिन मे उनकी देशभक्ति को नजदीक से समझने का प्रयास कर रहा था।
ला रे तीन चाय बना...तेरी ही होटल खुली है बस बाकी की तो कल हमने.......डाली है।
अधिकारी क्या समझें फील्ड मे हम कैसे-क्या और कितनी परेशानियों के साथ काम करते हैं ? हमने  कल 'फलां' पटेल से कह दिया था कि सीहोर एसपी आफिस के चक्कर लगा के आजा उससे होगा क्या ? जो यहां से हम करेंगे वही साहब मंजूर करेंगे। 

मैं भी चाय की गुजारिश करता रहा लेकिन होटल वाला कहता रहा कि पहले इन्हें निपटा दूं फिर आप को देता हूँ__मैने भी कहा कि कोई जल्दी नहीं पहले आप इन पुलिस वालों को निपटा लो हमारा क्या?

बात आगे बढती है---वो एक पत्रकार ने बेहद अंटशंट लिखा था अपने थाने के बारे मे उससे क्या उखड़ा ? अरे वो दुबला सा पत्रकार , उसमे एक सपाटे की जान नहीं है। बैचारे व्यास जी के बारे मे हरकुछ लिख रहा था, क्या हुआ उससे__किसी भी दिन उसे रिमांड पे लेकर पत्रकारिता उसकी.....भर देंगे।

अपनी बिरादरी पर हो रहे वाणी हमले से मैं अंदर ही अंदर आग बबूला हो रहा था और मुझमें भगतसिंह और चंद्रशेखर आजाद की आत्मा प्रविष्ट होने लगी थी लेकिन चाणक्य ने रोका और मैं फिर जैसा था वैसा ही चुपचाप उनकी बातचीत की गोलियाँ सीने पर झेलता रहा।

एक आरक्षक बोला- दोलिया वाले प्रकरण मे पटेल से बात करो, देता रोकड़ा तो ठीक_नहीं तो उसे भी अंदर करो---चाय की चुस्कियों के बीच सिपाही बोला..मैने तो कल ही कहा था साले को जाने मत दो लेकिन दीवान जी ने नहीं सुनी।

तीसरा पुलिस वाला बोला- वो बनिया भोत ऐंठ रहा था उसकी भी कल तबियत हरी कर दी, कह दिया जा कहीं से भी हथेली लगवा लेना लेकिन जो सामान तूने मेरे थाने मे भेजा था उसका पैसा नहीं मिलेगा--कालाबाजारी कर रहा है और पुलिस से सामान(किराने) का पैसा मांग रहा है। दुकानदारी करना भूल जाएगा-साले।

ला रे दो चाय और लगा दे_पैसे डायरी मे लिख लेना....अच्छा "फलां" गांव के उस केस का क्या हुआ.....!
जवाब मे सैनिक बोला उस केस मे तो रुपया ऊपर बंट गया। साले ऊपर वाले खा गए जबकि मेहनत अपन ने की थी__तीसरा बोला- अधिकारी बेहद खउआ है खुद ही जीम रहा है इससे पहले कभी किसी अधिकारी ने ऐसा नहीं किया। खैर निपट जाएगा जल्दी ही।

चलिए देखेंगे उसे भी, अभी मोटर वालों का हफ्ता भी बंद है और दारु वालों ने भी पेमेंट नहीं किया। कल जुए के फलां अड्डे से भी एक धेला नहीं मिला उसका कहना है कि लाकडाउन के बाद से ही धंधा पिटा हुआ चल रहा है। हां सट्टा के खाई वालों ने टेका जरुर लगाया चार हफ्ते का पेमेंट एकसाथ कर डाला।
चौथा पुलिस वाला बोला--नहीं सट्टे वाला सेठ ईमानदार है उसका हिसाब चोखा है जो कह देता है वो करता है।

इधर मैं लगातार चाय आने का इंतज़ार कर रहा था इसी बीच एक मोटरसाइकिल आकर रुकती है उसपर सवार दो व्यक्ति नीचे उतरकर साक्षात दंडवत होते हैं तभी एक पुलिस वाले की आवाज गूंजती है दो चाय ओर लगा रे___हां बोल तेरी भागी बहन का क्या हुआ !! नहीं मिली साहब,   -पुलिस व‍ाला बोलता है---ऐसे मिलेगी क्या ? हमे मालूम है कौन भगाकर ले गया...साले अपनी बेन-बेटियों को खुद संभालो कि यह ठेका भी हमने ले लिया,,, खैर तू आया है तो हम कुछ तो करेंगे ही लेकिन बता जेब ठंडी है या गरम ? >>>हुज़ूर यह रखो लेकिन बहन को ला दो__ठीक है कल तक मिल जाएगी
फिर एक आवाज़ गूंजती है सुन रे चाय डायरी मे मत लिखना इससे ले लेना।__जा 12 चाय का पैसा दे और जा थाने मे बैठ हम आ रहे हैं।
उधर मैं चाय के इंतज़ार मे आधा घंटा गुजार चुका था पुलिस वालों की खिदमत के चलते मेरी ख्वाहिश शून्य हो चुकी थी मैने चाय वाले से कहा कि अच्छा तो हम चलते हैं वह बोला फिर कब मिलोगे...? मैने कहा जुमेरात को।
मन नहीं माना मैं थाने पहुंच गया_देखते ही एक पुलिस वाला बोला तू तो अभी होटल मे भी दिखा था, बता भैया क्या लफड़ा है मैने कहा कुछ नहीं बस यूं ही चला आया__वह बोला यूं ही यहां क्यूँ चला आया, आना ही था तो थाने मे शंकर जी का मंदिर है वहां चला जाता....तेरे पाप धुल जाते यह तो नर्क का द्वार है यहां से दूर रहना। मेरे से रहा नहीं गया और पूछ बैठा कि क्या पुलिस व‍ाले हो या शिक्षक ??
उसने कहा पुलिस वाला बाद मे ,लेकिन मैं पहले शिक्षक पुत्र हूँ इसीलिए ऐसा बोला__व्यवहार बाद मे-संस्कार पहले बोलते हैं।
फालतू के लफड़े मे मत पड़ो श्रावण मास है सोमवार का दिन, शंकर जी के दर्शन करो और घर का रास्ता पकड़ो।
मैं घर आ गया साहब, वरदायनी कलम पकड़ी__जो हुअा "सत्यकथा" चंद लब्जो़ मे लिख डाली।
मैं शर्मसार था_उधर थाना गुलजार था....सुबह उनकी भी थी ,, सुबह मेरी भी थी लेकिन फर्क इतना था वह बेपरवाह और मैं निगाहबान था...जय हिंद
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