लेखिका 

उड़ान सपनों की..... 

फोन पर घंटी जा रही थी... फोन उठने में हो रही देरी से उसकी बेकरारी बढ़ती जा रही थी, मानों घडी के सेकंड के कांटे की आवाज उसके ही पहलू में ही धड़क रही हों। खैर, इंतजार की घड़ियाँ गुजरी....। उधर से शालू की चहकती आवाज उसके कानों में आई...

"बुआ बहुत अच्छा रहा रिजल्ट...  " 
उसके मुँह से निकला.... "कांग्रेचुलेशन" .. 
थोड़ी देर इधर उधर की बातों के बाद शालू की आवाज की खनक के साथ... जिज्ञासा का भाव भी सुनाई से रहा था..। 
....." एक बात बताओ आप बुआ "..."पापा कह रहे थे ,मेरी बहन ने पूरे शहर में नाम रोशन किया था, अकेले फर्स्ट आकर..." और आपने अपने समय में मेरिट में टॉप किया था। 

इसके बाद शालू क्या बोलती रही... न ही उसने कुछ सुना और न ही शालू की किसी बात का कोई जवाब दे पाई। बहुत कुछ एक फिल्म की तरह घूम गया, उसकी आँखों के सामने ...
आज 26 सालों बाद नई पीढ़ी के आगे उसका जिक्र... जिसे वो खुद भूल गयी थी ... उस दिन को ..उसके समय मे 2 ही कॉलेज हुआ करते थे इंटर तक,  एक गर्ल्स और एक बॉयज... उस समय रिजल्ट भी 22% गया था, अच्छे अच्छे विद्यार्थी भी फेल हो गए थे...  पास पड़ोस के 10 किलोमीटर तक की लड़कियां आती थी पढ़ने जीजीआईसी में... ऐसे में उसका अकेले फर्स्ट आना घर परिवार सभी के लिए ख्वाब ही तो था लेकिन मोहल्ले भर में उसकी तारीफ के पुल बांधे जा रहे थे तो बधाईयों का तांता भी लगा हुआ था.. लगता भी क्यों नहीं लड़को में कोई भी फर्स्ट नही आया था, पर तब न कही नाम छपा न ही कोई मैडल मिला... लेकिन खुशी से सभी घर वाले झूम गए..। उसकी खुशी बड़ी अस्थायी साबित हुई... जैसे ही आगे की पढ़ाई की चर्चा शुरू हुई...। घर परिवार में सबको जैसे सांप सूंघ गया हो... जैसे तैसे उच्च शिक्षा तो ग्रहण कर पाई लेकिन फिर जो उसकी उड़ान आसमान का सातवां स्तर छूना चाहती थी.. उस पर ब्रेक लग गया, उसके ख्वाबो को सुला दिया गया ,संस्कारो की झीनी सी चादर से ढंककर.... सदा सदा के लिए...। 
एक बार उसने अपने सर को झटका देकर अतीत को परे धकेलना चाहा... लेकिन यादें इतनी आसानी से कहाँ पीछा छोड़ती हैं...। अब यादें गुजिस्तां वक्त की पोटली में... उन खुशियों को टटोलने लगी... जो उसके हिस्से में आने से रह गई थी...। या यूँ कहें कि मुस्कान ने जो सपने देखे वो उसके अपने हो ही न सके....। 
मुस्कान बचपन से ही मेधावी छात्रा रही थी ,बहुत सारे ख्वाब देखे थे उसने,कुछ बनना चाहती थी वो, ऊँची उड़ान भरना चाहती थी,कभी भी घर मे सिमटकर हाउस वाइफ बनना नही चाहा था उसने ।
समय का दोष कहे या किस्मत का , छोटी सी जगह में लोग पसंद नही करते थे,अकेले कही बाहर भेजना, या फिर नौकरी लग जाने पर नौकरी करवाना, सर्विस करती लड़की के लिए लड़का कहाँ ढूंढेंगे, तब ज्यादातर लोग घरेलू लड़की की ही डिमांड करते थे।
सभी को खुश रखकर मुस्कान ने वही किया, जो सभी को पसंद था, पढ़ाई से शादी तक.... किस्मत भी अच्छी ,सभी बहुत अच्छे मिले या यूं कह लो शायद उसे सभी कुछ मैनेज करना बखूबी आता था।
आज बरसो बाद उसकी भतीजी का रिजल्ट आया, जिज्ञासा सभी को होती है ,ये जानते हुए भी कि बहुत अच्छा गया होगा रिजल्ट,क्योकि आज तो इतनी अच्छी मार्किंग होती जितनी उसके समय मे तो सपने में भी नही सोचा जा सकता था... 
आज मुस्कान अपने सारे ख्वाब अपनी बेटी में देखती है.... वो जो करना चाहेगी ,कुछ भी हो , करवाना ही है उसे... उसके ख्वाबो को उड़ान भरते देखना चाहती है ,पूरे होते देखना चाहती है जिससे कही एक और मुस्कान अपनी भावनाओं का दम न तोड़ दे।

मोहिनी गुप्ता, गोला गोकर्ण नाथ, लखीम पुर खीरी, उप्र

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परिचय 

मोहिनी गुप्ता , गोला गोकर्ण नाथ, लखीमपुर, उत्तर प्रदेश की निवासी हैं। आप गृहिणी होने के साथ साथ साहित्य सेवा में भी अपना समय दान करती हैं। आपका एक काव्य संग्रह भाव भागीरथी प्रकाशित हो चुका है। साथ ही विभिन्न मंचों पर आपकी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं। काव्य लेखन आपकी प्रमुख विधा है। कहानी लेखन में भी आप पारंगत हैं। एम पी मीडिया पॉइंट पर आपका हार्दिक स्वागत है। 
संपादक
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समीक्षा 

उड़ान सपनों की.... उस दौर का जिक्र करती कहानी है... जब लड़कियों के सपनों को.... घरवालों की इच्छा आसानी से चकनाचूर कर पाती थी.... उस समय के परिजनों की गलती इसलिए भी नहीं कही जा सकती क्योंकि.... जिस देश, काल और परिस्थितियों..... में जीवन गतिमान होता है.... उसी दौर के चलन के हिसाब से निर्णय लिए जाते हैं.... ऐसा ही कुछ मुस्कान के साथ हुआ.....। याद कीजिये इसी गुजरे दौर में... नारी सशक्तिकरण का विचार बना... जो धीरे धीरे आंदोलन भी बन गया..... चूंकि सामाजिक परिवर्तन की गति बहुत धीमी होती है..... इस कारण तत्काल परिणाम नही देखने में आते.... मौजूदा वक्त में.... हर क्षेत्र में कंधे से कंधा मिलाकर... सक्रिय आधी आबादी... संभवतः उसी विचार की देन है.... जो लगभग चालीस पचास साल पहले आया था.....। खैर बात लेखिका मोहिनी गुप्ता की कलम से.... लिखी कहानी की..... जो एक बात यह तो कहती ही है कि... बच्चियों को पढ़ाई के क्षेत्र में वो सब करवाया जाने लगा है.... जैसा बच्चियाँ चाहती हैं.... यह हो भी रहा है.... लेकिन कथानक के अन्त में जब हम इस बिंदु को रेखांकित कर के... डी कोड करते हैं.... तब अनकहा एक और सच सामने आता है.... वह वाकई चौँका देता है... सच यह है कि.... बीते दौर के युवा - युवती... जो आज माँ बाप की भूमिका में हैं.... खुद उस समय जो करना चाहते थे... वो नहीं कर पाए.. अब उम्मीद संतान से कर रहे हैं.... देखने में यह भी आता है कि.. संतान कुछ और करना चाहती है.. लेकिन माता पिता अपने अधूरे सपनों को... संतान से पूरा करवाने की चाहत में.. अपनी इच्छा उस पर थोप सी देते हैं... इसी बात को फिल्म थ्री इडियट में दर्शाया था.... वही यह कहानी भी अपने मुखर मौन से बोलती नजर आती है...। कहानी को प्रवाहमान बनाए रखने में सफल... लेखिका ने... सहजता के साथ अपने संदेश को पाठक तक पहुंचाया है... बहुत बहुत बधाई... मोहिनी जी.....। 

शैलेश तिवारी, सम्पादक

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