ग़ज़ल 

 हिज्र ही अब मेरा गहना होगा 
अब तो तन्हाई में रहना होगा 

और कुछ दिन ये ही सहना होगा 
मत करीब आ , मेरे हमदम इतने 
हिज्र ही अब मेरा गहना होगा 

जीना बेमानी है यूँ मर के ,
 वक्त की धारा में बहना होगा । 

पार दरिया जो किया है उसने , 
कुछ तहफ्फुज़ का तो पहना होगा 

ये इमारत , ये हसीं ताज - महल
 एक दिन सबको ही ढहना होगा 

यूँ करोना ने , कहर बरपा है 
बस करो - ना , ये ही कहना होगा
----------

पतझड़ 


आज हवा ने फिर 
पतझड़ पर लिक्खे गीत 
नए पत्ते ताली बजा कर ढूंढें मीत 
नए बौराए बादल ने भी रच डाला
 अपना राग
 सूर्यदेव ने धीमी कर दी
 वहां गैस की आग 
शाम आज कुछ जल्दी आई
 रस्से रीत गए
 आज हवा ने फिर 
पतझड़ पर लिक्खे गीत
 नए चंदा ने अपने दरवाज़े 
बंद कर लिए
 कैसे जला अंगीठी 
बैठे तारे हाथ सेंकते 
जैसे रात बहुत सन्नाटा लाई 
जुगनू जीत गए 
आज हवा ने फिर 
पतझड़ पर लिक्खे गीत 
नए वार्डरोब से याद 
तुम्हारी चुपके आई 
कैडबरीज सी मीठी 
जाने कितनी यादें लाई
 सोच रहा मन बिना 
तुम्हारे बरसों बीत गए 
आज हवा ने फिर 
पतझड़ पर लिखे गीत नए

रेखा राजवंशी, सिडनी, आस्ट्रेलिया

---------------


 परिचय 

रेखा राजवंशी पिछले बीस वर्षों से सिडनी, ऑस्ट्रेलिया में रह रहीं हैं। वहाँ वे हिंदी भाषा और साहित्य के प्रचार के लिए कार्यरत हैं। सिडनी विश्वविद्यालय में प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम में उन्होंने कई वर्ष हिंदी पढ़ाई है, ऑस्ट्रेलिया के विभिन्न शहरों के कवियों को जोड़कर दो काव्य संकलनों का भी संपादन किया है। प्रवासी साहित्य में उनका विशेष योगदान है वहाँ के आदिवासियों की लोक कथाओं का उन्होंने अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद किया है जिसके लिए इन्हें राष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार मिला। साहित्य अकादमी दिल्ली और विश्वरंग भोपाल में उनको ऑस्ट्रेलिया से आ
मंत्रित किया गया। ऑस्ट्रेलिया और भारत की संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित भी किया गया हैं। 1996 में राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने अन्य कवयित्रियों के साथ काव्य पाठ के लिए इन्हें आमंत्रित और सम्मानित किया। 
रेखा राजवंशी ने अब तक आठ पुस्तकों का लेखन, संपादन और संपादन किया है। कहानी का पहला संकलन किताबघर से प्रकाशित हो रहा है ।आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है। 
संपादक
Share To:

Post A Comment: