लेखिका
ज़िन्दगी दाँव पर , मैं लगाती रही।
देश हित में कदम , मैं बढ़ाती रही।
गाँव घर शहर शिक्षा से परिपूर्ण हो
ज्ञान का दीप मैं तो जलाती रही।
हर घड़ी नारियों को दे कर हौंसला
नारी सम्मान को मैं जगाती रही।
जाति मज़हब के मतभेद को बिसरा के
धर्म की ध्वजा ऊँचा उठाती रही।
कौन किस बात से है ख़फा भूल कर
अंजु दिन - रात महफ़िल सजाती रही।
नारी हूँ पेय शीतल रूप हूँ मैं।
कभी हूँ अंत तो आरंभ भी हूँ
काली, चंडी , कई स्वरूप हूँ मैं।।
सदा मिहनत कि रोटी तोड़ती हूँ
लबालब स्वेद की इक कूप हूँ मैं।
रचा ईश्वर ने जो अनमोल तौफा
वही सबसे अलग अभिरूप हूँ मैं।।
अलग क़िरदार हैं मेरे धरा पर
निभाती ले के इच्छारूप हूँ मैं।
मुहब्बत बाँटना है काम मेरा
जहां में प्रेम का प्रतिरूप हूँ मैं।।
समझ लो अंजु को अब जिस नज़र से
तुम्हारी नज़रों के अनुरूप हूँ मैं।
गजल
_____________________________ज़िन्दगी दाँव पर , मैं लगाती रही।
देश हित में कदम , मैं बढ़ाती रही।
गाँव घर शहर शिक्षा से परिपूर्ण हो
ज्ञान का दीप मैं तो जलाती रही।
हर घड़ी नारियों को दे कर हौंसला
नारी सम्मान को मैं जगाती रही।
जाति मज़हब के मतभेद को बिसरा के
धर्म की ध्वजा ऊँचा उठाती रही।
कौन किस बात से है ख़फा भूल कर
अंजु दिन - रात महफ़िल सजाती रही।
अंजु दास "गीतांजलि"...✍️ पूर्णियाँ बिहार
++++++++++++++ग़ज़ल-
कभी तपती हुई सी धूप हूँ मैंनारी हूँ पेय शीतल रूप हूँ मैं।
कभी हूँ अंत तो आरंभ भी हूँ
काली, चंडी , कई स्वरूप हूँ मैं।।
सदा मिहनत कि रोटी तोड़ती हूँ
लबालब स्वेद की इक कूप हूँ मैं।
रचा ईश्वर ने जो अनमोल तौफा
वही सबसे अलग अभिरूप हूँ मैं।।
अलग क़िरदार हैं मेरे धरा पर
निभाती ले के इच्छारूप हूँ मैं।
मुहब्बत बाँटना है काम मेरा
जहां में प्रेम का प्रतिरूप हूँ मैं।।
समझ लो अंजु को अब जिस नज़र से
तुम्हारी नज़रों के अनुरूप हूँ मैं।


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