लेखिका 

इश्क़ में चांद केज़मीं पे चाँद कहाँ रोज़ रोज़

उतरता है ये और बात है
कल चांद उतरा था जमीं पर
चांदनी ने पूछा कहो मिया कैसे हो

हौले से थाम कर हाथ उसका
चांद टुकुर टुकुर देखता रहा देर तक
और फिर कुछ ठहर कर .. चांदनी से
चांद ने कहा खूसूरत हो तुम
मोहब्बत की कोई मूरत हो तुम

चांदनी इतराती रही खुद पर
इश्क़ में चांद के चांदनी
सरगम कोई हौले हौले गुनगुनाती रही
चांद चला गया लौट कर अपने जहां में
खुद को चांदनी में जरा सा छोड़ कर

बिछड़ने का वो लम्हा गमगीन था
जानती थी चांदनी उसे जाना ही था
नहीं पास कोई ठिकाना ही था
चांदनी को भी अब ग़म ना था
जाते जाते चांद रूह रंग गया
क्यों कि मोहब्बत नहीं है नाम
सिर्फ पा लेने का एक दूसरे को
बिछड़ के भी दिल धड़कते हैं
एक दूसरे के लिए
कहने को दूरी है
देखो तो चांद से ही चांदनी पूरी है ।

मंगला रस्तोगी, खानपुर, नई दिल्ली

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परिचय- 

मंगला रस्तोगी , खानपुर, नई दिल्ली की निवासी हैं। गृहिणी की जिम्मेदारी निभाते हुए साहित्य सृजन कर रही हैं। मूल रूप से आप काव्य विधा में ही लेखन करती हैं। स्वतंत्र लेखन करते हुएआलेख आदि भी लिखती हैं। जो विभिन्न मंचों पर प्रकाशित होते रहे हैं। एमपी मीडिया पॉइंट पर आपका स्वागत है। 
संपादक
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