लेखिका 

लेखनी......

     लेखनी हुई अवरुद्ध आज

     कर कंपित देख दशा जग की।

     मानव डर कर है डोल रहा

     व्याकुलता है बढ़ती सब की।

  

     मौत खड़ी हंसती है आज 

     मानव विनीत ले भाव खड़ा।

     कब किसके द्वार पहुच जाये

     उलझन सबके मन आन पड़ा।

     भयभीत झुका सिर मनुज खड़े

     देख रहे थे सपना नभ की।


      कैसी घड़ियां हैं आन पड़ी

      नन्हा विषाणु है काल बना।

      बलशाली कहलाता सबसे

      कैसा उससे ही  रार  ठना ।

      भयभीत बना बलवान खड़ा

      कह पाये ना बातें मन की।


      चिंतित चितवन कम्पित वाणी

      निर्झर सी नयनन नीर ढरे।

      जो डोल रहे अभिमानी  वे

      दिखें कम्पित से वे भी डरे।

      मानव डर कर है डोल रहा

      व्याकुलता है बढ़ती सब की

       डॉ सरला सिंह स्निग्धा
         दिल्ली

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 परिचय  

डॉ. सरला सिंह "स्निग्धा", दिल्ली की निवासी हैं। उच्च शिक्षित होने के साथ आप शिक्षण कार्य के अलावा लेखन के लिए भी समय निकालती हैं।  आपके दो एकल काव्य संग्रह - "जीवनपथ"तथा "आशादीप" सहित "मेरी 

कुण्डलियां " एकल कुण्डलिया संग्रह, "जीवन का समर" कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। आपने "हिन्दी के आधुनिक पौराणिक प्रबन्ध काव्यों में पात्रों का चरित्र विकास" विषय पर शोधग्रंथ भी तैयार किया है। आपके 26से अधिक विभिन्न साझा काव्यसंग्रह तथा कहानी संग्रह में कविता कहानियों का प्रकाशन हो चुका है।  विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सतत लेखन कार्य प्रकाशित होता रहा है। आपका एमपी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है। 

संपादक

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