आँसूओं में भी मुस्कुरा रहे हो.... 
             स्व. चंद्रकांत दासवानी (पत्रकार)

शैलेश तिवारी, सीहोर 
एमपी मीडिया पाइंट 

आज युवा पत्रकार... 
चंद्रकांत दासवानी.. यानी बल्लू भाई ... का जन्म दिवस... तो उनकी याद भी आना ही है...। पत्रकार के रूप में अपनी तरुणाई से ही... पहचान बना ली.. बल्लू भाई ने..। वजह भी थी खबरों के मामले में.... उनका अनूठा नजरिया....। उससे भी ज्यादा संवेदनशील दिल... जो धड़कता था.. किसी की परेशानी से...। एक परेशान की कॉल... बैचेन कर देती थी उन्हें.... जब तक उसकी परेशानी को हल न कर दें....। किसी की मुस्कुराहटों पर निसार हो जाने का हुनर.. ऊपर वाले ने.. उन्हें बख़्शा भी दोनों हाथों से था...।.....  पराये का दर्द... अपनी जागीर समझता था...। और उसके लिए... खुशी की रजिस्ट्री कराने को.. हमेशा तैयार रहने वाला.. वह अनुज बल्लू.. हमारे बीच शरीर से भले ही न हो... लेकिन अपने व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों से... हमसे जुदा हो ही नहीं सकता...। मैं यह पंक्तियाँ ठीक उस समय लिख रहा हूँ... जो हमारे मिलने का... तय वक्त रहा... सालों साल...। प्रत्यक्ष.... नहीं संभव हुआ तो... फ़ोन से ही मिले... लेकिन मिले जरूर....। याद नहीं सालों बाद... आज सत्रह अप्रेल... की सूरज की पहली किरण... पहली बार उसका जय राम जी भाई साहब का पैग़ाम... लिए बिना आ गई...। बड़ा अजीब लगा... दिल भले ही जार जार हो.. दिमाग तो हकीकत से वाक़िफ़ है...। याद है न बल्लू... चार जनवरी की वह शाम... तुमने कहा था... दिल्ली से आकर मेरी कुंडली देखना....।.. लेकिन तुमने इंतजार ही नही किया मेरा...। लौटा तो... सभी परिजन की निगाहें मुझे सवाल करती लगी मुझसे...। बताओ क्या जवाब देता...। हालांकि यह घटना मेरे अधिकार क्षेत्र की थी भी नहीं...। लेकिन उस दिन यह जानकारी भी मिली... सालों पहले जो हनुमान चालीसा तुम्हें सौंपा था.... वह तुम अनेकानेक होंठों को बाँट गए..। उऋण तो हो ही चुके थे..। तब लगा श्रेष्ठ व्यक्तित्व को ईश्वर कम आयु ही देता है.. शंकराचार्य और विवेकानंद की तरह...। समाज में परिवर्तन के ध्वज वाहक बने.. तब भी आपको यह खूब अच्छे से मालूम होता था कि... किस से क्या काम लेना है... आप ने धूनी साहब की अलख जगाकर... सभी समाज बंधुओं को.. एक जाजम पर लाकर बैठाने का काम सहजता से संपन्न कर दिया..। एस एस डी मंडल का संचालन करते करते... आपने सभी को एक सूत्र में बांधने का अद्भुत कार्य किया.. जिसका आगे गतिमान बनाए रखना भी... पहले तो कठिन सा लगा.. लेकिन सभी आपकी याद के वशीभूत होकर.. या आपको श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए.. आपके शुरू किए कामों को.. बिना आपके सफलता से गतिमान बनाए हुए हैं..। यह सिंधी समाज के लिए.. बड़ी उपलब्धि है...। यादों में ही नही... भाई सच में... खबर लिखते वक्त तो पास ही होते हो... और उसकी हेडिंग बनाते समय तो... टोकते से लगते हो... भाई साहब.. यह ज्यादा सही है...। आज आँसूओं में भी तुम्हीं मुस्कुरा रहे हो...।
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