सुनो द्रोपदी शस्त्र उठा लो....
अब न गोविंद आयेगें....
लेखिका
गतांक से आगे....
नारी के साथ जो कुछ भी हो रहा है, छेडछाड से लेकर शोषण तक...। इसमें समाज की मानसिकता का दोष है। इसको बदलने के लिए ईव फ्रेंडली वातावरण की आवश्यकता है तो महिलाओ को स्वयं को सामर्थ्यवान बनाने की भी...। एक साथ कई बिंदुओं के विचार और उस विचार के परिणाम में आए निष्कर्ष भी सामूहिक रूप से अपनाये जाने की जरूरत है। तभी देश और दुनिया की आधी आबादी को उसका पूरा हक मिलना संभव है। इसी बानगी को लेकर लेख की अंतिम किश्त प्रस्तुत है।
किस किस पर रोएं जार जार
किस किस पर करें चीत्कार
हिंसा का तांडव
निर्लज्जता का बीभत्स प्रदर्शन
व्यवस्था की खामोशी
पहरुओं की बेहया हंसी
हर तरफ आग
खुली तलवारें बेख़ौफ़
जाए कहाँ कोई शरण मांगने
और अगर स्त्री की अस्मत को ही होना है तार तार
तो डूब मरे यह समाज
जो न जाने किस नपुंसक खोल में दुबका अब भी दे रहा दुहाई
धिक्कार बहुत छोटा- सा शब्द है
बोलें और चबा जाएं
किसी अन्य स्त्री की इज्जत के दागदार होने तक।**
समाज और परिवेश को ईव फ्रेंडली भी तो बनाइये।
ईव टीज़िंग, या छेड़खानी, एक बेहूदा चीज़ है, जो लड़कियां इसका शिकार होती हैं वही जानती हैं कि छेड़खानी कितनी अपमानजनक हो सकती है।मगर क्या कोई विशेष दस्ता (रोमियो जैसे कालजयी पात्र का इस संदर्भ में नाम लेना भी बुरा जान पड़ता है) इसका हल हो सकता है...? और क्या यह कोई विशेष पुलिस बल है, जो पुलिस चोरी, छिनतई, और लूट पाट तो रोक नहीं पाती, छेड़खानी कैसे रोक लेगी...?
छेड़खानी तो कहीं भी होती है, मेरे गांव के मेले में भी, तो क्या आप पुलिस बल को दस गुना बीस गुना करने जा रहे हैं कि चप्पे चप्पे पे आपकी स्क्वाड फैली हो...?
बेहतर हो कि आप सड़कों पर समुचित रौशनी की व्यवस्था करें, अधिक से अधिक महिला थाने बनायें, बल्कि पूरे पुलिस तंत्र को ही वूमेन फ्रेंडली बनायें जिससे लड़कियां अपने साथ हुई छेड़खानी की शिकायत दर्ज कर सकें, और उन शिकायतों पर बजाये लड़कियों को नसीहत देने के सचमुच कार्यवाई हो।और सबसे बढ़कर लड़कियों को सक्षम बनायें, छेड़खानी अगर मौके पर ही रोकी जा सकती है तो वो लड़कियों के साहस से ही रोकी जा सकती है, नहीं तो छेड़खानी रोकने के नाम पर हमें अकसर ही युवा जोड़ों को अपमानित किये जाने की घटनाएं सुनाई पड़ेंगी, लड़के लड़कियों के आपसी मेलजोल पर बंदिशें लगेंगी।जी हां, यह मेलजोल ज़रूरी है, आप सेक्स एजुकेशन को कोर्स में शामिल करिये और कम उम्र लड़के लड़कियों को जागरूक करिये।
इसकी चिंता छोड़िये कि लड़के लड़कियां आज इसके और कल उसके साथ घूम रहे हैं,उनके बीच के स्वाभाविक आकर्षण को मारना ही कुंठा से भरी ऐसी पीढ़ी पैदा करता है जो सड़कों पर, बसों में, सिनेमा हॉलों के अंधेरे में लड़कियों को छूने को आतुर हाथ फैलाये घूमती है, क्योंकि जब मन में प्रेम का भाव नहीं रहेगा तो बस शरीर ही शरीर होगा।
दूसरी बात कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था में स्त्रियों की रक्षा के नाम पर हमेशा से उन्ही पर पाबंदियों का इतिहास रहा है, इसीलिये यह डर निराधार नहीं है कि छेड़खानी के खिलाफ अभियान भी इसी ओर जायेगा और मोरल पुलिसिंग का काम करेगा, और जहां सचमुच कुछ गलत हो रहा हो उसे रोकने के लिए पुलिस को किसी अलग नाम से विशेष दस्ते की क्या ज़रूरत है,पुलिस का यही काम है, वो बस अपना काम करे,अगर सचमुच लफंगों को पकड़ा जाये तो इसमें क्या ग़लत है...??
स्कूल हो या कोई संरक्षण गृह ,सड़क हो या कोई पूजा स्थल ,स्त्रियाँ बस देह भर रह गई हैं ,एक ओर पूजन तो दूसरी ओर मानमर्दन का खेल | यह बर्बरता उस दोगली मानसिकता की बानगी लिए है जिसमें महिला अस्मिता का कोई मान ही नहीं रहा... ।
आये दिन हो रहीं ऐसी घटनाएँ सभ्य समाज का असभ्य चेहरा दिखाने काफी हैं । दुष्कर्माें को रोकने के लिए सरकार द्वारा कठोरतम कानून बनाये जाने के बावजूद इनके आँकड़े बढ़ रहे हैं । हर उम्र की महिलाओं के साथ छेड़छाड़ और बदसलूकी की दुष्प्रवृत्ति देखने को मिल रही है ।यह बीमार होते समाज और बिखरते संस्कारों की भी बानगी है ...।
सचमुच, एक भय मन में घर कर गया है । ऐसा खौफ़ जो बेटियों के पढ़ने-लिखने , आगे बढ़नेऔर सपने पूरे करने पर भारी पड़ रहा है । आखिर क्यों और कब तक व्यवस्था की लचरता देश की आधी आबादी को भय और मजबूरी के हालातों में जीने को विवश करेगी...? ?
कब तक अमानुषों के मन में उपजी कुत्सित सोच का शिकार बनती रहेंगी महिलायें ...?
गत वर्ष की बात है मैं एक पत्रिका पढ़ रही थी,जिसमे वर्ष 2018 में जीतकर लौटी मैरी कॉम ने अपने साथ हुई यौन हिंसा और नस्लीय उत्पीड़न के बारे में अपने बेटों को एक चिट्ठी लिखकर बताया था ।
मैरी कॉम की शानदार जीत पर गर्वित होने वाले भारत को, खासकर उसके पुरुषों और युवकों को इसे जरूर पढ़ना और गुनना चाहिए और इससे इससे सीखना चाहिये...।
मैरी_कॉम_लिखती_हैं ---
मेरे बेटो,
●तुम अभी नौ और तीन साल के हो, लेकिन इस उम्र में भी हमें अपने आपको महिलाओं के साथ व्यवहार को लेकर जागरूक हो जाना चाहिए।
●मेरे साथ सबसे पहले मणिपुर में छेड़छाड़ हुई, फिर दिल्ली और हरियाणा के हिसार में। एक दिन मैंसुबह साढ़े आठ बजे साइकिल रिक्शा से ट्रेनिंग कैंप जा रही थीं, तभी एक अजनबी अचानक मेरी तरफ लपका और उसने मेरे स्तन पर हाथ मारा। गुस्से में आकर मैंने उसका पीछा किया लेकिन वो भाग निकला। मुझे उसे न पकड़ पाने का दुख है क्योंकि में तब तक कराटे सीख चुकी थीं।
● एक और ऐसी ही घटना मेरे साथ तब हुई जब मैं 17 वर्ष की थी । में यह सब इसलिए बता रही हूँ क्योंकि अपनी शक्तिभर कोशिशों से मैंने अपने देश के लिए बहुत नाम कमाया और पदक विजेता के रूप में पहचान बनाई लेकिन मैं एक महिला के तौर पर भी इज्जत चाहती हूँ ।
● बेटो, तुम्हारी तरह मुझे भी दो आँखें और एक नाक है। हमारे शरीर के कुछ हिस्से भिन्न है और यही वो चीज है जो हमलोगों को अलग करती है। हम अपने दिमाग का इस्तेमाल अन्य पुरूषों की तरह सोचने के लिए करते हैं और हम अपने हृदय से महसूस करते हैं जैसा कि तुम करते हो। स्तन छूने और नितंब थपथपाने को मैं पसंद नहीं करती। ऐसा मेरे और मेरे दोस्त के साथ दिल्ली और हरियाणा में ट्रेनिंग कैंप से बाहर टहलने के दौरान हुआ।
● इससे क्या फर्क पड़ता है कि मैं क्या पहनती हूँ और दिन और रात के कब कहाँ जाती हूँ। महिलाओं को बाहर जाने से पहले क्यों सोचना चाहिए? ये दुनिया जितना तुम्हारे लिए है, उतनी ही मेरी भी है। मैं कभी नहीं समझ सकी कि महिलाओं को छूने से पुरुषों को किस तरह का आनंद मिलता है।
● अब तुम बढ़ रहे हो तो मैं ये बताना चाहती हूँ कि छेड़छाड़ और रेप अपराध है और इसका दंड काफी कठोर है। अगर तुम देखते हो कि किसी युवती से छेड़छाड़ हो रही है तो मेरा आग्रह है कि तुम उस युवती की सहायता करो। ये सबसे दुखद बात है कि हम समाज के प्रति बेपरवाह होते जा रहे हैं। दिल्ली में एक युवती की चाकुओं से गोद-गोदकर हत्या कर दी गई जबकि वहाँ लोग उसकी मदद कर सकते थे, लेकिन किसी ने कुछ नहीं किया।
● तुम ऐसे घर में पले-बढ़े हो जहाँ हम लोगों ने तुम्हें सम्मान और समानता के बारे में सिखाया है। तुम्हारे पिता नौ बजे से पाँच तक नौकरी नहीं करते जैसा कि तुम्हारे दोस्तों के पिता करते हैं। तुम्हारे पिता इसलिए घर पर रहते हैं कि हम दोनों में से किसी एक को तुम लोगों के पास होना जरूरी होता है। ट्रेनिंग और काम के दौरान मैं ज्यादातर वक्त बाहर बिताती हूँ। अब जबकि मैं सांसद हूं तब भी ऐसा ही होता है।
● मेरे मन में तुम्हारे पिता के लिए बहुत सम्मान है जिन्होंने मेरे लिए और तुम्हारे लिए अपना पूरा समय लगा दिया है। तुम लोग जल्द ही ‘हाउस हसबैंड’ शब्द सुनोगे जो न तो कलंक है और न ही अपमानजनक। तुम्हारे पिता मेरी ताकत हैं, मेरे पार्टनर हैं, और मेरे हर फैसले का वे समर्थन करते हैं…।
● खेद की बात है कि पूर्वोत्तर के लोगों को चिंकी कहकर बुलाया जाता है । यह भद्दी और नस्लवादी टिप्पणी है। मेरी तमाम प्रसिद्धि के बावजूद लोग मुझे उस तरह से नहीं पहचानते जिस तरह से वे क्रिकेटरों को पहचानते हैं । कुछ लोग उन्हें चीनी समझ लेते हैं। मुझे राज्यसभा का सांसद होने पर गर्व है और में इस अवसर का लाभ उठाकर यौन अपराधों के प्रति जागरूकता फैलाने की कोशिश करूंगी ।
● इस देश के बच्चों को ये बताना हमारा कर्तव्य है कि महिलाओं के शरीर पर केवल उनका हक है और उनके साथ किसी तरह की जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए। बलात्कार का सेक्स के साथ कोई संबंध नहीं है, ये भी सबको समझना चाहिए। मैं छेड़खानी करने वालों की पिटाई कर सकती हूँ, लेकिन सवाल ये है कि ऐसी स्थिति बनती ही क्यों है।
● बेटो तुम्हे सिर्फ अपने लिए ही नही जीना है, तुम्हे शक्तिभर कोशिश करके एक ऐसे समाज का निर्माण करने में योगदान देना है जिसमें लड़कियाँ सुरक्षित हों और सम्मानित हों।
मेरे विचार से यदि हमारे समाज की हर माँ अपने बच्चों को मैरी कॉम जैसी सिख दें तो महिलाओं के साथ हो रहे यौन उत्पीड़न,बलात्कार एवं छेड़छाड़ की किस्से आधे से ज्यादा ऐसे ही बन्द हो जाये...।
ऐसे समय में जब स्त्री की स्मिता खतरे में हैं और कानून व्यवस्था आँखे बंद किये मूक-बधिर बनी हुई है तो आज मुझे पुष्यमित्र उपाध्याय जी की एक कविता अनायास ही याद आ गयी---
~~सुनो द्रोपदी शस्त्र उठा लो, अब गोविंद ना आएंगे,
छोड़ो मेहंदी खड़ग संभालो
खुद ही अपना चीर बचा लो
द्यूत बिछाए बैठे शकुनि,
... मस्तक सब बिक जाएंगे
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आएंगे ।
कब तक आस लगाओगी तुम, बिक़े हुए अखबारों से,
कैसी रक्षा मांग रही हो दुशासन दरबारों से
स्वयं जो लज्जा हीन पड़े हैं
वे क्या लाज बचाएंगे
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो अब गोविंद ना आएंगे
कल तक केवल अंधा राजा, अब गूंगा-बहरा भी है
होंठ सिल दिए हैं जनता के, कानों पर पहरा भी है
तुम ही कहो ये अश्रु तुम्हारे,
किसको क्या समझाएंगे?
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आएंगे....~~।।
अब न गोविंद आयेगें....
लेखिका
गतांक से आगे....
नारी के साथ जो कुछ भी हो रहा है, छेडछाड से लेकर शोषण तक...। इसमें समाज की मानसिकता का दोष है। इसको बदलने के लिए ईव फ्रेंडली वातावरण की आवश्यकता है तो महिलाओ को स्वयं को सामर्थ्यवान बनाने की भी...। एक साथ कई बिंदुओं के विचार और उस विचार के परिणाम में आए निष्कर्ष भी सामूहिक रूप से अपनाये जाने की जरूरत है। तभी देश और दुनिया की आधी आबादी को उसका पूरा हक मिलना संभव है। इसी बानगी को लेकर लेख की अंतिम किश्त प्रस्तुत है।
किस किस पर रोएं जार जार
किस किस पर करें चीत्कार
हिंसा का तांडव
निर्लज्जता का बीभत्स प्रदर्शन
व्यवस्था की खामोशी
पहरुओं की बेहया हंसी
हर तरफ आग
खुली तलवारें बेख़ौफ़
जाए कहाँ कोई शरण मांगने
और अगर स्त्री की अस्मत को ही होना है तार तार
तो डूब मरे यह समाज
जो न जाने किस नपुंसक खोल में दुबका अब भी दे रहा दुहाई
धिक्कार बहुत छोटा- सा शब्द है
बोलें और चबा जाएं
किसी अन्य स्त्री की इज्जत के दागदार होने तक।**
समाज और परिवेश को ईव फ्रेंडली भी तो बनाइये।
ईव टीज़िंग, या छेड़खानी, एक बेहूदा चीज़ है, जो लड़कियां इसका शिकार होती हैं वही जानती हैं कि छेड़खानी कितनी अपमानजनक हो सकती है।मगर क्या कोई विशेष दस्ता (रोमियो जैसे कालजयी पात्र का इस संदर्भ में नाम लेना भी बुरा जान पड़ता है) इसका हल हो सकता है...? और क्या यह कोई विशेष पुलिस बल है, जो पुलिस चोरी, छिनतई, और लूट पाट तो रोक नहीं पाती, छेड़खानी कैसे रोक लेगी...?
छेड़खानी तो कहीं भी होती है, मेरे गांव के मेले में भी, तो क्या आप पुलिस बल को दस गुना बीस गुना करने जा रहे हैं कि चप्पे चप्पे पे आपकी स्क्वाड फैली हो...?
बेहतर हो कि आप सड़कों पर समुचित रौशनी की व्यवस्था करें, अधिक से अधिक महिला थाने बनायें, बल्कि पूरे पुलिस तंत्र को ही वूमेन फ्रेंडली बनायें जिससे लड़कियां अपने साथ हुई छेड़खानी की शिकायत दर्ज कर सकें, और उन शिकायतों पर बजाये लड़कियों को नसीहत देने के सचमुच कार्यवाई हो।और सबसे बढ़कर लड़कियों को सक्षम बनायें, छेड़खानी अगर मौके पर ही रोकी जा सकती है तो वो लड़कियों के साहस से ही रोकी जा सकती है, नहीं तो छेड़खानी रोकने के नाम पर हमें अकसर ही युवा जोड़ों को अपमानित किये जाने की घटनाएं सुनाई पड़ेंगी, लड़के लड़कियों के आपसी मेलजोल पर बंदिशें लगेंगी।जी हां, यह मेलजोल ज़रूरी है, आप सेक्स एजुकेशन को कोर्स में शामिल करिये और कम उम्र लड़के लड़कियों को जागरूक करिये।
इसकी चिंता छोड़िये कि लड़के लड़कियां आज इसके और कल उसके साथ घूम रहे हैं,उनके बीच के स्वाभाविक आकर्षण को मारना ही कुंठा से भरी ऐसी पीढ़ी पैदा करता है जो सड़कों पर, बसों में, सिनेमा हॉलों के अंधेरे में लड़कियों को छूने को आतुर हाथ फैलाये घूमती है, क्योंकि जब मन में प्रेम का भाव नहीं रहेगा तो बस शरीर ही शरीर होगा।
दूसरी बात कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था में स्त्रियों की रक्षा के नाम पर हमेशा से उन्ही पर पाबंदियों का इतिहास रहा है, इसीलिये यह डर निराधार नहीं है कि छेड़खानी के खिलाफ अभियान भी इसी ओर जायेगा और मोरल पुलिसिंग का काम करेगा, और जहां सचमुच कुछ गलत हो रहा हो उसे रोकने के लिए पुलिस को किसी अलग नाम से विशेष दस्ते की क्या ज़रूरत है,पुलिस का यही काम है, वो बस अपना काम करे,अगर सचमुच लफंगों को पकड़ा जाये तो इसमें क्या ग़लत है...??
स्कूल हो या कोई संरक्षण गृह ,सड़क हो या कोई पूजा स्थल ,स्त्रियाँ बस देह भर रह गई हैं ,एक ओर पूजन तो दूसरी ओर मानमर्दन का खेल | यह बर्बरता उस दोगली मानसिकता की बानगी लिए है जिसमें महिला अस्मिता का कोई मान ही नहीं रहा... ।
आये दिन हो रहीं ऐसी घटनाएँ सभ्य समाज का असभ्य चेहरा दिखाने काफी हैं । दुष्कर्माें को रोकने के लिए सरकार द्वारा कठोरतम कानून बनाये जाने के बावजूद इनके आँकड़े बढ़ रहे हैं । हर उम्र की महिलाओं के साथ छेड़छाड़ और बदसलूकी की दुष्प्रवृत्ति देखने को मिल रही है ।यह बीमार होते समाज और बिखरते संस्कारों की भी बानगी है ...।
सचमुच, एक भय मन में घर कर गया है । ऐसा खौफ़ जो बेटियों के पढ़ने-लिखने , आगे बढ़नेऔर सपने पूरे करने पर भारी पड़ रहा है । आखिर क्यों और कब तक व्यवस्था की लचरता देश की आधी आबादी को भय और मजबूरी के हालातों में जीने को विवश करेगी...? ?
कब तक अमानुषों के मन में उपजी कुत्सित सोच का शिकार बनती रहेंगी महिलायें ...?
गत वर्ष की बात है मैं एक पत्रिका पढ़ रही थी,जिसमे वर्ष 2018 में जीतकर लौटी मैरी कॉम ने अपने साथ हुई यौन हिंसा और नस्लीय उत्पीड़न के बारे में अपने बेटों को एक चिट्ठी लिखकर बताया था ।
मैरी कॉम की शानदार जीत पर गर्वित होने वाले भारत को, खासकर उसके पुरुषों और युवकों को इसे जरूर पढ़ना और गुनना चाहिए और इससे इससे सीखना चाहिये...।
मैरी_कॉम_लिखती_हैं ---
मेरे बेटो,
●तुम अभी नौ और तीन साल के हो, लेकिन इस उम्र में भी हमें अपने आपको महिलाओं के साथ व्यवहार को लेकर जागरूक हो जाना चाहिए।
●मेरे साथ सबसे पहले मणिपुर में छेड़छाड़ हुई, फिर दिल्ली और हरियाणा के हिसार में। एक दिन मैंसुबह साढ़े आठ बजे साइकिल रिक्शा से ट्रेनिंग कैंप जा रही थीं, तभी एक अजनबी अचानक मेरी तरफ लपका और उसने मेरे स्तन पर हाथ मारा। गुस्से में आकर मैंने उसका पीछा किया लेकिन वो भाग निकला। मुझे उसे न पकड़ पाने का दुख है क्योंकि में तब तक कराटे सीख चुकी थीं।
● एक और ऐसी ही घटना मेरे साथ तब हुई जब मैं 17 वर्ष की थी । में यह सब इसलिए बता रही हूँ क्योंकि अपनी शक्तिभर कोशिशों से मैंने अपने देश के लिए बहुत नाम कमाया और पदक विजेता के रूप में पहचान बनाई लेकिन मैं एक महिला के तौर पर भी इज्जत चाहती हूँ ।
● बेटो, तुम्हारी तरह मुझे भी दो आँखें और एक नाक है। हमारे शरीर के कुछ हिस्से भिन्न है और यही वो चीज है जो हमलोगों को अलग करती है। हम अपने दिमाग का इस्तेमाल अन्य पुरूषों की तरह सोचने के लिए करते हैं और हम अपने हृदय से महसूस करते हैं जैसा कि तुम करते हो। स्तन छूने और नितंब थपथपाने को मैं पसंद नहीं करती। ऐसा मेरे और मेरे दोस्त के साथ दिल्ली और हरियाणा में ट्रेनिंग कैंप से बाहर टहलने के दौरान हुआ।
● इससे क्या फर्क पड़ता है कि मैं क्या पहनती हूँ और दिन और रात के कब कहाँ जाती हूँ। महिलाओं को बाहर जाने से पहले क्यों सोचना चाहिए? ये दुनिया जितना तुम्हारे लिए है, उतनी ही मेरी भी है। मैं कभी नहीं समझ सकी कि महिलाओं को छूने से पुरुषों को किस तरह का आनंद मिलता है।
● अब तुम बढ़ रहे हो तो मैं ये बताना चाहती हूँ कि छेड़छाड़ और रेप अपराध है और इसका दंड काफी कठोर है। अगर तुम देखते हो कि किसी युवती से छेड़छाड़ हो रही है तो मेरा आग्रह है कि तुम उस युवती की सहायता करो। ये सबसे दुखद बात है कि हम समाज के प्रति बेपरवाह होते जा रहे हैं। दिल्ली में एक युवती की चाकुओं से गोद-गोदकर हत्या कर दी गई जबकि वहाँ लोग उसकी मदद कर सकते थे, लेकिन किसी ने कुछ नहीं किया।
● तुम ऐसे घर में पले-बढ़े हो जहाँ हम लोगों ने तुम्हें सम्मान और समानता के बारे में सिखाया है। तुम्हारे पिता नौ बजे से पाँच तक नौकरी नहीं करते जैसा कि तुम्हारे दोस्तों के पिता करते हैं। तुम्हारे पिता इसलिए घर पर रहते हैं कि हम दोनों में से किसी एक को तुम लोगों के पास होना जरूरी होता है। ट्रेनिंग और काम के दौरान मैं ज्यादातर वक्त बाहर बिताती हूँ। अब जबकि मैं सांसद हूं तब भी ऐसा ही होता है।
● मेरे मन में तुम्हारे पिता के लिए बहुत सम्मान है जिन्होंने मेरे लिए और तुम्हारे लिए अपना पूरा समय लगा दिया है। तुम लोग जल्द ही ‘हाउस हसबैंड’ शब्द सुनोगे जो न तो कलंक है और न ही अपमानजनक। तुम्हारे पिता मेरी ताकत हैं, मेरे पार्टनर हैं, और मेरे हर फैसले का वे समर्थन करते हैं…।
● खेद की बात है कि पूर्वोत्तर के लोगों को चिंकी कहकर बुलाया जाता है । यह भद्दी और नस्लवादी टिप्पणी है। मेरी तमाम प्रसिद्धि के बावजूद लोग मुझे उस तरह से नहीं पहचानते जिस तरह से वे क्रिकेटरों को पहचानते हैं । कुछ लोग उन्हें चीनी समझ लेते हैं। मुझे राज्यसभा का सांसद होने पर गर्व है और में इस अवसर का लाभ उठाकर यौन अपराधों के प्रति जागरूकता फैलाने की कोशिश करूंगी ।
● इस देश के बच्चों को ये बताना हमारा कर्तव्य है कि महिलाओं के शरीर पर केवल उनका हक है और उनके साथ किसी तरह की जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए। बलात्कार का सेक्स के साथ कोई संबंध नहीं है, ये भी सबको समझना चाहिए। मैं छेड़खानी करने वालों की पिटाई कर सकती हूँ, लेकिन सवाल ये है कि ऐसी स्थिति बनती ही क्यों है।
● बेटो तुम्हे सिर्फ अपने लिए ही नही जीना है, तुम्हे शक्तिभर कोशिश करके एक ऐसे समाज का निर्माण करने में योगदान देना है जिसमें लड़कियाँ सुरक्षित हों और सम्मानित हों।
मेरे विचार से यदि हमारे समाज की हर माँ अपने बच्चों को मैरी कॉम जैसी सिख दें तो महिलाओं के साथ हो रहे यौन उत्पीड़न,बलात्कार एवं छेड़छाड़ की किस्से आधे से ज्यादा ऐसे ही बन्द हो जाये...।
ऐसे समय में जब स्त्री की स्मिता खतरे में हैं और कानून व्यवस्था आँखे बंद किये मूक-बधिर बनी हुई है तो आज मुझे पुष्यमित्र उपाध्याय जी की एक कविता अनायास ही याद आ गयी---
~~सुनो द्रोपदी शस्त्र उठा लो, अब गोविंद ना आएंगे,
छोड़ो मेहंदी खड़ग संभालो
खुद ही अपना चीर बचा लो
द्यूत बिछाए बैठे शकुनि,
... मस्तक सब बिक जाएंगे
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आएंगे ।
कब तक आस लगाओगी तुम, बिक़े हुए अखबारों से,
कैसी रक्षा मांग रही हो दुशासन दरबारों से
स्वयं जो लज्जा हीन पड़े हैं
वे क्या लाज बचाएंगे
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो अब गोविंद ना आएंगे
कल तक केवल अंधा राजा, अब गूंगा-बहरा भी है
होंठ सिल दिए हैं जनता के, कानों पर पहरा भी है
तुम ही कहो ये अश्रु तुम्हारे,
किसको क्या समझाएंगे?
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आएंगे....~~।।


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