लेखक 

गीत


टूटी  जिनसे उम्मीद सारी, करें  हम उनका  भी इन्तज़ार।
या तो उनमें ही ख़ूबियाँ है,या फिर ज़िंदा है हम में प्यार।।

उनके  हक़ में  दिन के उजाले, अपने हिस्से  अँधेरी  रातें  
उनकी  राहों  में  फूल  बरसे, अपनी  राहों  में बिछे  काँटे
ज़ख्मी  हो गए  पैर  हमारे,  उनके  रहे कई  पाँव  पखार।
या तो उनमें ही ख़ूबियाँ है, या फिर ज़िंदा है हम में प्यार।।

सुबह  किये जो  मीठे  वादे,  शाम  हुई   दिये बदल  इरादे
गए ज़माने  की सीेख ज़ुबानें, नहीं दिखते अब  सीधे-सादे
उनकी नज़र में  सिवाय उनके, बस्ती सारी  गवाँर  बीमार।
या तो उनमें  ही ख़ूबियाँ है, या फिर ज़िदा  है हम में प्यार।।

हमें  याद  है  इक  दिन  हमारे, पास  आये थे  हाथ  पसारे
हमने अपना दिल दे दिया था,बिना कुछ सोचे बिना बिचारे
बिठा कर कंधों  पर हम अपने, कराये थे  उन्हें दरिया पार।
या तो उनमें  ही ख़ूबियाँ है, या फिर ज़िंदा  है हम में प्यार।।

वक्त  क्या बदला  वह भी बदले, बिस्तर उनके हुए रूपहले
नादाँ हम जो  पाल कर रखते,सूनी आँख में ख़्वाब सुनहले
जितना  जिन्हें  भूलाना  चाहें, याद आते देख  उतनी  बार।
या तो उनमें  ही ख़ूबियाँ है, या फिर ज़िंदा  है हम में प्यार।।

कमलेश्वर ओझा
सिंगरौली, मध्यप्रदेश
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परिचय


कमलेश्वर ओझा - सिंगरौली, मध्यप्रदेश में निवास करते हैं। 
मूल रूप से बलिया, उत्तर प्रदेश के रहने वाले श्री ओझा कोल इन्डिया से सेवा निवृत्त है।  विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में हास्य व्यंग्य लेख एवं कविता प्रकाशित होती रही हैं। गृह पत्रिका 'वसुंधरा' में सह संपादक का दायित्व वहन करते हैं। लगभग तीन दशक से मंचों पर काव्य पाठ तथा संचालन का कार्य करते आए हैं। साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर का एम पी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है। 
संपादक
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