"राजकुमार"
लेखिका
मम्मी मैं राहुल से ही शादी करूँगी।
वो बहुत अच्छा लड़का है और मुझे बहुत चाहता भी है। बिल्कुल मेरे सपनों जैसा।
पापा से बोल कर किसी भी तरह करा दीजिये। प्लीज मम्मी!
मेरी प्यारी मम्मी!
ठीक है। करता क्या है? ये तो बताओ....खैर.. छोड़ो तुम तो मानोगी नहीं।
अपने ही ज़िद में रहती हो।
ओहो ..
मम्मी!
कितना मुझे जानती हो।
वैसे तो राहुल का ही ये सब है।यहाँ है ही कौन। आप दोनों के आलावा। मैं ही तो हूँ।बस अकेली । आपके लिए।
फिर भी.. राहुल महीने के 10 हज़ार के लगभग कमा ही लेता है ।
ठीक है कल ही बुलाकर पण्डित जी को सब फिक्स कर देती हूँ।
सब ठीक रहा तो 15 दिन के बाद शादी कर देंगे।
अब खुश।
जी मम्मी ! लव यू ।
स्नेहा खुशी से झूम कर मम्मी के गले से लिपट गई,जैसे मानो सड़क बनने वाली तार कोल के भाँति चिपक क्या... एक दूजे में समाहित हो गई हो।
कुछ दिन बाद शादी हो गई ।
स्नेहा राहुल के किराए के मकान में रहने लगी। अपने माँ पापा की इकलौती औलाद करोड़ो की जायदाद को त्याग करके।
सब कुछ अच्छा चल रहा था।स्नेहा के मनमुताबिक। मगर धीरे- धीरे राहुल का बर्ताव दिन- ब- दिन बदलने लगा।
रोज शराब पीकर देर रात घर आना। स्नेहा पर शक करना।और
सजने सँवरने पर भी वह रोक टोक करने लगा।
यदि स्नेहा कुछ कहती तो लड़ाई झगड़े को निमंत्रण देने वाला हाल हो जाता।उस दिन।
एक दिन तो हद्द ही हो गया।
बात यहाँ तक बढ़ गयी कि राहुल स्नेहा पर हाथ भी उठाने लगा।जिससे स्नेहा और भी टूट गई।
खुलकर रो भी नही पाती थी।
बन्द कमरे में पड़ी रहती ।
किसी से कुछ कह भी नही पा रही थी।
बस मन ही मन कुढ़ती ,घुटती और खुद पर ही खीझ पड़ती, ऐसा *राजकुमार* भगवान किसी को न दें। क्या सपने थे मेरे सब ख़ाक में मिल गया।
अंजली श्रीवास्तव, फिरोजाबाद , उत्तरप्रदेश
----------समीक्षा
राजकुमार..... उस कहानी का शीर्षक है... जो संतान की जिद के सामने माता पिता के झुकने का कथानक है...। नायिका स्नेहा... जैसा कि नाम से लग रहा है... काफी स्नेह से पाली गई संतान है... जो एक अमीर घराने की इकलौती भी है...। ज़ाहिर है बचपन से ही उसने जो सपने देखे.... वह उसके माँ बाप ने पूरे किए... यानि संतान का पालन पोषण.... उसकी रुचि के हिसाब से हुआ...। जबकि होना था... माँ बाप की नीति के अनुसार...। जहाँ नीति पर रुचि हावी हो जाती है तो... हर राजकुमार... राहुल की तरह मिल जाता है....। स्नेहा का सपना भी.... अपना कहाँ हो पाया...। जिंदगी में जो शहनाई गूंजती रहीं.... अब उनकी जगह केवल तन्हाई हैं...। वो भी आँसू भरी.... किससे शिकायत करे... कहाँ फरियाद करें...। सब कुछ उसी के आग्रह.. अनुरोध पर हुआ...। राजकुमार... कथानक राहुल के चरित्र को और ठीक से गढ़ा जाता तो... कथानक में निखार और बढ़ जाता.. ऐसा मेरा मत है...। बाकी कहानी में प्रवाह की सहजता को भली भाँति संजोया गया है...। भाषा की सरलता में कथानक को पिरोया गया है....। कहानी नई पीढी को आगाह भी करती है... कि सपने वाले राजकुमार को... उसके भूगोल से कम... और उसके साथ की भावी केमिस्ट्री से ज्यादा परखना चाहिए....। लेखिका सुंदर और संदेशप्रद कथानक का ताना बाना... बुनने के लिए बधाई की पात्र हैं....।
शैलेश तिवारी, संपादक


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