लेखिका
"क्या हुआ अमन तुम इतने उदास क्यों रहते हो और कक्षा में सबसे अलग भी बैठते हो..? तुम लंच भी सब के साथ नहीं करते ..।" गौतम ने लंच टाइम में अमन के पास जाकर पूछा।
"मुझे नहीं मालूम गौतम ..। मेरे साथ ना तो कोई बैठना चाहता है और ना ही कोई लंच करता है ।" अमन ने उदासी भरे शब्दों में कहा ।
गौतम ने हाल ही में शहर के सबसे नामी श्रेष्ठतम स्कूल में दाखिला लिया था और उसके व्यवहार को देखकर सब उससे दोस्ती की इच्छा रखते थे। पर सिर्फ एक अमन ही था जिससे उसकी बात नहीं होती थी। वो अक्सर अमन को कक्षा में सबसे अलग और उदास बैठे हुए पाता।
"अच्छा..! ये बताओ क्या शुरू से ही तुम से कोई बात नहीं करता ...??"
"ऐसा नहीं है गौतम ! दाखिला के समय सब मुझसे बात करते थे पर मालूम नहीं क्यों धीरे-धीरे सब मुझसे दूर हो गए। "
" कोई बात नहीं अमन आज से मैं तुम्हारा दोस्त हूँ।" गौतम ने उसकी तरफ अपनी दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए कहा।
"सच..!"
"हाँ अमन..!"
इतना सुनते ही अमन खुशी से उछल पड़ा। सभी बच्चे छुट्टी के समय भागकर गौतम के पास आए और सब उसे कुछ खुसुर- पुसुर करने लगे। यह सब देखकर कुछ ही समय पहले खुश दिख रहे अमन के चेहरे पर मायूसी छा गई ।
दूसरे दिन अमन जब स्कूल पहुँचा उसका मन उदास था । रह - रह कर यही ख्याल आता.., पता नहीं और बच्चो की भाँती गौतम भी कहीं दोस्ती का हाथ ना छोड़ दे..! अमन क्लास में पहुँचकर यथावत अपनी सबसे आखिरी बेंच पर जाकर बैठ गया। पर उसकी नज़रें गौतम पर ही टिकी हुई थी। सारे बच्चे क्लास में पहुँच गए थे । गौतम भी आकर अपने अन्य दोस्तो के साथ बैठ गया । ये देखकर अमन की आशा टूट गई। तभी टीचर भी क्लास में पहुँची और बच्चों की हाजिरी लेने लगी।
गौतम ने बीच में ही उठकर कहा, "मैम मेरी सीट अमन के साथ कर दीजिए । आज से मैं वहीं बैठूंगा।"
सुनते ही सारे बच्चे आश्चर्य भरी नजरों से गौतम को घूरने लगे। टीचर समझ गई और उन्हें गौतम के फैसले पर प्रसन्नता हुई और गौतम की पीठ थपथपाते हुए कहा ,"ठीक है, गौतम आज से तुम वहीं बैठना।"
गौतम अपना बैग लेकर अमन के पास चला गया । "मै सब जानता हूँ दोस्त तुम्हारे पापा इस स्कूल में एक बहुत ही छोटे ओहदे पर काम करते है ना.. और शायद इसी वजह से बच्चे ना तो तुम्हारे साथ बैठना चाहते है और ना ही लंच शेयर करते है।"
यह सुनकर अमन के मुख पर उदासी छा गई..।
"उदास मत हो अमन! ,आज से हम पक्के दोस्त हुए और अपना लंच भी हम मिल बाँटकर खाएंगे..।"
यह सुनते ही अमन के मुख पर खुशी की चमक आ गई ।
कहानी, लघुकथा एवं कविता आदि विधाओं में लिखित कई रचनाएं भिन्न भिन्न जगहों पर प्रकाशित हो चुकी है।
एमपी मीडिया पॉइंट पर आपका स्वागत है।
संपादक
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शैलेश तिवारी
"रिश्ते "
"क्या हुआ अमन तुम इतने उदास क्यों रहते हो और कक्षा में सबसे अलग भी बैठते हो..? तुम लंच भी सब के साथ नहीं करते ..।" गौतम ने लंच टाइम में अमन के पास जाकर पूछा।
"मुझे नहीं मालूम गौतम ..। मेरे साथ ना तो कोई बैठना चाहता है और ना ही कोई लंच करता है ।" अमन ने उदासी भरे शब्दों में कहा ।
गौतम ने हाल ही में शहर के सबसे नामी श्रेष्ठतम स्कूल में दाखिला लिया था और उसके व्यवहार को देखकर सब उससे दोस्ती की इच्छा रखते थे। पर सिर्फ एक अमन ही था जिससे उसकी बात नहीं होती थी। वो अक्सर अमन को कक्षा में सबसे अलग और उदास बैठे हुए पाता।
"अच्छा..! ये बताओ क्या शुरू से ही तुम से कोई बात नहीं करता ...??"
"ऐसा नहीं है गौतम ! दाखिला के समय सब मुझसे बात करते थे पर मालूम नहीं क्यों धीरे-धीरे सब मुझसे दूर हो गए। "
" कोई बात नहीं अमन आज से मैं तुम्हारा दोस्त हूँ।" गौतम ने उसकी तरफ अपनी दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए कहा।
"सच..!"
"हाँ अमन..!"
इतना सुनते ही अमन खुशी से उछल पड़ा। सभी बच्चे छुट्टी के समय भागकर गौतम के पास आए और सब उसे कुछ खुसुर- पुसुर करने लगे। यह सब देखकर कुछ ही समय पहले खुश दिख रहे अमन के चेहरे पर मायूसी छा गई ।
दूसरे दिन अमन जब स्कूल पहुँचा उसका मन उदास था । रह - रह कर यही ख्याल आता.., पता नहीं और बच्चो की भाँती गौतम भी कहीं दोस्ती का हाथ ना छोड़ दे..! अमन क्लास में पहुँचकर यथावत अपनी सबसे आखिरी बेंच पर जाकर बैठ गया। पर उसकी नज़रें गौतम पर ही टिकी हुई थी। सारे बच्चे क्लास में पहुँच गए थे । गौतम भी आकर अपने अन्य दोस्तो के साथ बैठ गया । ये देखकर अमन की आशा टूट गई। तभी टीचर भी क्लास में पहुँची और बच्चों की हाजिरी लेने लगी।
गौतम ने बीच में ही उठकर कहा, "मैम मेरी सीट अमन के साथ कर दीजिए । आज से मैं वहीं बैठूंगा।"
सुनते ही सारे बच्चे आश्चर्य भरी नजरों से गौतम को घूरने लगे। टीचर समझ गई और उन्हें गौतम के फैसले पर प्रसन्नता हुई और गौतम की पीठ थपथपाते हुए कहा ,"ठीक है, गौतम आज से तुम वहीं बैठना।"
गौतम अपना बैग लेकर अमन के पास चला गया । "मै सब जानता हूँ दोस्त तुम्हारे पापा इस स्कूल में एक बहुत ही छोटे ओहदे पर काम करते है ना.. और शायद इसी वजह से बच्चे ना तो तुम्हारे साथ बैठना चाहते है और ना ही लंच शेयर करते है।"
यह सुनकर अमन के मुख पर उदासी छा गई..।
"उदास मत हो अमन! ,आज से हम पक्के दोस्त हुए और अपना लंच भी हम मिल बाँटकर खाएंगे..।"
यह सुनते ही अमन के मुख पर खुशी की चमक आ गई ।
पूनम सिंह दिल्ली
-----------------परिचय
पूनम सिंह नई दिल्ली निवासी हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं और हिंदी साहित्य में स्वतंत्र लेखन करती हैं।कहानी, लघुकथा एवं कविता आदि विधाओं में लिखित कई रचनाएं भिन्न भिन्न जगहों पर प्रकाशित हो चुकी है।
एमपी मीडिया पॉइंट पर आपका स्वागत है।
संपादक
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समीक्षा
बाल मनो विज्ञान पर आधारित कहानी " रिश्ते" में बच्चों की मानसिकता का वर्णन है। बाल मनोदशा हर युग की अलग अलग होती है। कथानक का आरम्भ ही इसी बात से होता है। और जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ती जाती है वैसे वैसे कहानी जो कहना चाह रही है वह स्पष्ट होता जाता है। किसी भी बालक का पालन पोषण दर असल माँ बाप द्वारा बच्चों को दिये गए संस्कार.... आसपास के वातावरण से मिले विचार..... मित्रों और सहपाठियों से मिले व्यवहार... शिक्षकों से मिल रही नैतिकता.... के आधार पर होता आया है...। अब इसमें बुद्धू बक्सा (टीवी).... के कुछ विभिन्न प्रकार के चरित्र.... और मोबाइल से देखे और सीखे गए खेलों के नियम..... भी बच्चों का खासा प्रभावित करने लगे हैं। इन्हीं सब बिंदुओं के जमावड़े से...... बने हैं नामी गिरामी स्कूल के बच्चे.... उनको अमन के साथ वही करना था... जो उन्होंने जाना और समझा....। यह बिंदु कहानी बिल्कुल बिना कहे कह जाती है.... कि टीचर सब कुछ जानते हुए भी.... बच्चों के बीच की दीवार को गिरा नहीं रहे हैं।..... यानि कहीं न कहीं उनकी सहमति और स्वीकृति बच्चों के कृत्य में शामिल है। ... यह अप्रत्यक्ष रूप से सामाजिक और शिक्षा व्यवस्था दोनो की... कार्यप्रणाली और मानसिकता दोनों पर सवालिया निशान भी लगाता है....। गौतम...... ही अमन का दोस्त बनकर.... उसको वह खुशी देता है... जो हर बच्चे की पहली चाह होती है। बहुत साहत्यिक अलंकारों.. शाब्दिक मायाजाल... कठिन शब्दों... से रची नहीं है यह कहानी...। पठनीय है.... बहुत बहुत बधाई....शैलेश तिवारी


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