लेखिका 

मरजाणा


"'बीबी! तेरे लई चा बणा देवां? चा नाल मठियां वी ले लैलीं।" सतवंत ने बीबी से पूछा तो उसकी ज़बान पर भी इक्कीस नंबर बंगले वाली मेमसाहब के घर से लाई मठरियों का स्वाद आ गया। उसने बीबी की ओर देखा मगर वे कुछ न बोलीं। सतवंत उनकी ख़ामोशी को रज़ामंदी मान रसोई की ओर चल दी मगर मठरी का डिब्बा उठाते ही उसे बीबी की ख़ामोशी का राज़ समझ आ गया। 
   बीबी मां थीं वे चुप रह गई पर सतवंत नहीं रह पाई, "मरजाणा! लै गया सारी मठियां आपदे यार बेलियां लई। कमांदा ता कुछ है नहीं ऐय्याशी करा लो बस।"
    "चाची! छेती चल, चाचा कुएं च डिग गया।" पड़ौस की बच्ची की बात सुन घबराहट के मारे सतवंत का कलेजा मुंह को आ गया। कुछ देर पहले जिसे जी भर कोसा ईश्वर से उसकी खैर मांगती वह नंगे पांध ही कुएं की ओर दौड़ पड़ी।
  कुएं के पास ही पूरण पानी से तरबतर ठंड से कांपता बैठा था उसे सलामत देख सतवंत को चैन आ गया। "पूरण तू कुएं च किवें डिग पया?" एक बुजुर्ग ने पूछा।
 "मेरी बोतल कुएं च पै गई सी बोतल लैण गया सी।" पूरण ने नशे में लड़खड़ाती आवाज में कहा।
  पूरण का जवाब सुन उसके प्रति सतवंत की कोमल भावनाएं एक बार फिर असमय अवसान पा गई। सच तो यह था कि पूरण से विवाह के बाद उसकी भावनाएं हज़ारों बार बेमौत मरीं और हर बार उसके दिल से एक ही आवाज आई 'मरजाणा।'
अंकिता भार्गव ,  राजस्थान 
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अंकिता भार्गव, राजस्थान
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