लेखिका 

पापी पेट

  मेरी नजर बार-बार एक अधेड़ महिला कलाकार के चित्र पर जाकर अटक जाती थी |   उस महिला के पास जाकर मैंने धीरे से पूछा,   “मैडम, लगता है..आपने यह चित्र जल्दीबाजी में बनाया है ? आपको तो सब पता है, यहाँ चित्र प्रतियोगिता चल रही है | ”

“ जी,आप क्या कहना चाहते हैं, मैं ठीक से समझी नहीं ? “ महिला कलाकार ने प्रश्न भरी दृष्टि से मेरी ओर देखते हुए कहा |

“ मैडम, इधर देखिये, इस पेंटिंग में आपने रोपनी का हरा रंग परफेक्ट भरा है | पर,  बगल में मजदूरी कर रहे लड़कों का रंग, ऐसा उखड़ा- उखड़ा ... अजीब सा क्यों है ?”

“क्या कहूँ बेटी ! माँ हूँ  !  माँ को चैन कहाँ !? बेटे की अभी-अभी शादी हुई है | यहाँ देहात में मजदूरी के उसे अच्छे पैसे नहीं मिलते थे | सो पेट के खातिर घर-द्वार छोड़कर वह पंजाब, फैक्ट्री में काम करने चला गया | फैक्ट्री मालिक उसे  अपने बेटे की तरह प्यार करते थे | फैक्ट्री का सारा हिसाब-किताब भी मेरे बेटे के जिम्मे रहता था |इतना भरोसा करते थे मालिक | 

पता नहीं, फैक्ट्री में एकाएक क्या घपला हुआ ! रातोंरात मेरे बेटे को जेल भेज दिया गया ! गाँव में सभी जगह यही चर्चा हो रही है कि  ‘ फेकतरी के मालिक तोहर बेटवा के फसा देलकौ |’  

मालिक का कुछ अता -पता नहीं है ! महीनों से फरार है | वो पैसे  वाला है , कोर्ट-कचहरी से चक्कर से तो बच ही जाएगा ! नाहक में मेरा बेटा,  बलि का बकड़ा बन गया !

 जब से मुझे यह खबर मिली , घर में बहुरिया बहुत उदास रहती है | न बिंदी लगाती..न अच्छे कपड़े पहनती और ना महावर |  जो पैसे मुझे पंजाब से आते थे, अब वो भी आने बंद हो गये ! घर की स्थिति डावांडोल हो गई है | 

पर, किसी के आगे हाथ फैलाना मुझे अच्छा नहीं लगता !  माँ की सिखाई चित्रकारी से दो पैसे कमा लेती हूँ| उसी से घर चलता है और बहुरिया के कॉलेज की पढाई भी | एक सपना है | 
...वह पढ़-लिख जायेगी तो स्वाबलंबी होकर गाँव में शिक्षा की अलख जगाएगी | फिर पेट के खातिर गाँव का गाँव खाली नहीं होगा ! दिल्ली-पंजाब  मजूरी करने कोई नहीं भागेगा ! और ना ही किसी बहुरिया के हाथों की मेहँदी फीकी पड़ेगी ! ” 

बुलंद आवाज की खनक के साथ उस महिला के चेहरे पर स्वाभिमान की चमक झलक रही थी | उसका गर्दन तना था | 
मैं पेंटिंग को नये सिरे से देखने लगी | इस बार पेंटिंग के सारे रंग मुझे एकदम साफ-साफ़ और सही लग रहे थे । 

                  ---मिन्नी मिश्रा /पटना                      

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परिचय


श्रीमति मिन्नी मिश्रा , पटना बिहार की निवासी हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त गृहणी हैं।  स्वतंत्र लेखन में आपकी रुचि है। आपको "लघुकथाश्री" सम्मान, कलमकार मंच से ,शीर्षक साहित्य से , भाषा सहोदरी से , नये पल्लव से और प्रजातंत्र का स्तम्भ, स्टोरी मिरर, साहित्य विचार प्रतियोगिता आदि से सम्मानित किया जा चुका है | इसके अलावा भी आप विभिन्न साहित्यिक मंचों से पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में आपकी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं। बहुमुखी प्रतिभा की धनी श्रीमति मिश्रा का एमपी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है। संपादक-----------------

समीक्षा 

जिंदगी के कैनवास पर... अभाव की तूलिका से... जब भाव के रंग... भरे जाते हैं... तब जन्म लेता है स्वाभिमान.. और स्वावलंबन...। यही जीवन का महत्वपूर्ण संदेश.... लेखिका की लघु कथा "पापी पेट".... अपने अंदर समेटे हुए है....। एक पेंटिंग के माध्यम से पूरे जीवन दर्शन को व्यक्त कर देना.... गागर में सागर भर देना जैसा लगता है...। पेंटिंग में नायक का बदरंग चित्र..... जिंदगी की तमाम... विषमताओं की व्यथा.... की कथा को आसानी से कह जाता है....। फेक्ट्री में हुए घपले में जेल पहुंचे बेटे की वजह से.... सामाजिक तानों और आर्थिक संकट में... भी माँ... अपने स्वाभिमान की न केवल रक्षा के लिए अदम्य साहस के साथ... संघर्ष की मशाल को मजबूती से थाम लेती है...। वरन किसी से दया याचना कर... जीवन यापन करने के.... पलायनवादी... मजबूर कदम के स्थान पर.... स्वावलंबन का मजबूत कदम उठाती है...। जो न केवल उसकी आर्थिक जरूरतों को पूरा करे.... बल्कि बहुरिया के पढ़ लिख जाने के बाद... गाँव में व्याप्त अशिक्षा के अंधकार.... को भी शिक्षा के उजियारे में बदल देने का सामर्थ्य रखने वाली बन जाए....। ताकि मजूरी से जीविका निर्वाह करने के लिए... गाँव से शहर की तरफ होने वाला... पलायन भी रुके... और उसके गाँव का युवा स्वाभिमान की रोटी कमाने का सामर्थ्य खुद के भीतर... पैदा कर सके...। लघु कथा... है तो ग्रामीण परिवेश की.. जिसकी स्थानीय बोली ये अहसास भी करा देती है.. लेकिन गहरे से देखा जाए तो... संपूर्ण भारत देश की प्रतिभाओ के विदेश पलायन.. की अनकही कहानी भी... अपने में समाए हुए है। कथानक का भाव पक्ष... एक विचारणीय प्रश्न भी है..? नदी की धारा की तरह सहज और सरल प्रवाह... की तरह कथानक को गूँथा गया है... शब्दों से बने वाक्यों में... जो अपने अर्थ के साथ भाव की उत्तंग लहरे भी छिपाये हैं... अपने अंतस में....। बढ़िया कहानी के लिए... बधाई मिन्नी मिश्रा जी...। 
शैलेश तिवारी, संपादक
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