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अमीरों पे रहम... गरीबों पे सितम... 


सरकार.... लोकतंत्र की... कल्याणकारी कही जाती है....। साम्यवाद से इतर.... लेकिन सभी नागरिकों से समान भाव रखने वाली....। ताज़ा हालात में आँखों के सामने जो मंजर है... वो कुछ और कहानी कह रहा है...। गरीबों के खून पसीने की कमाई से... की गई बचत... अमीर डकार रहे हैं.... और सरकार उन पर मेहरबान हो रही है...। भ्रष्ट तंत्र की जड़ों में पानी सींचती यह कहानी ... गरीबों की बचत से खिलवाड तो है ही... लेकिन बैंकिंग सेक्टर के लिए भी... यह शुभ संकेत नहीं ही हैं...। 
ऐसे अमीरों के लिए.... चाशनी में डूबा हुआ शब्द... विल फुल डिफ़ाल्टर... प्रयोग किया जाता है। असल में इस शब्द के मायने... किसी नटवरलाल की याद दिलाते हैं... इसका सीधी भाषा में अर्थ है... जान बूझ कर कर्ज का पैसा न चुकाना... । ऐसे कर्ज़ादारो पर.. मेहरबान है हमारी सरकार.... जिसने ऐसे अमीर लोगों का 68 हज़ार करोड़ रुपये... के कर्ज को राइट ऑफ कर दिया है...।... बात चौँकाने वाली यह है कि... वर्तमान सरकार ने अपने कार्यकाल में.. लगभग छः लाख करोड़ रुपये के कर्ज... जो इन अमीरों द्वारा लिए गए थे... राइट ऑफ किये हैं...। इतनी भारी भरकम राशि... इन अमीरों ने देश के विभिन्न बैंकों से कर्ज के रूप में ली थी....। जिसको नहीं चुका पाने के लिए... इन्होंने अपने आप को दिवालिया घोषित कर दिया...। इसके लिए सरकार द्वारा 2016 में स्थापित... एन सी एल टी... यानि नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्युनल ... ने इन्हें एक प्रमाण पत्र भी दिया कि... अब आप दिवालिया हैं... कोई भी आप से कर्ज नहीं मांगेगा....। मजे की बात है कि दिवालिया घोषित हो जाने के बाद भी... इनकी निजी जिंदगी की शान ओ शौकत... पर कोई फर्क नहीं पड़ता....। 
68 हजार करोड़ रुपये के कर्ज राइट ऑफ करने की ताज़ा जानकारी एक आर टी आई कार्यकर्ता... को रिजर्ब बैंक द्वारा दी गई... आर टी आई  के जवाब से उजागर हुई है। यह कार्यवाही उस दौर में हुई है.... जब  अमीर कर्ज़दार देश की जनता के पैसों को चूना लगाकर... देश छोड़कर भाग चुके थे...। एक बात और गौर करने लायक है कि... इन कंपनियों की नीलामी एन सी एल टी करती है..  जो अमीर इस तरह की दिवालिया कंपनी खरीदते हैं....। वो इसके लिए फिर उन्हीं बैंक से कर्ज लेते हैं... जहाँ जनता की गाढ़ी कमाई.. की बचत जमा है...। गारंटी अभी भी नही है कि.. खरीदार अमीर... फिर दिवालिया होने जैसी साजिश नहीं रचेंगे...। 
ये हुई रहम की कहानी.... अब गरीबों पे सितम भी देख लीजिए....। चार घंटे की अल्प अवधि के अल्टीमेटम के बाद लगे लॉक डाउन के दौरान... गरीब रोजी गँवा कर... रोटी से मुहाल हो जाता है..। सरकार उन्हें जरूरी अनाज आदि पहुंचाने की घोषणा करती है... लेकिन वह राशन.... कितने गरीब तक पहुँच पाया...? जान कर हैरत होगी कि.... जो सरकारी सूची में शामिल गरीब हैं.... उनकी जरूरत की तुलना में अभी तक... एफ सी आई के गोदामों से... केवल चालीस प्रतिशत अनाज ही सरकारी संस्थाओं ने उठा पाया है...। यानी साठ प्रतिशत तो अभी इंतजार में ही है....। उनकी गिनती सरकार के पास भी नहीं है कि.... कितने गरीब उसकी कल्याणकारी योजनाओं की सूची से बाहर हैं...। उस पर भी सितम यह कि... जितना गरीब को पहुंचाया जाने के लिए.. गोदामो से उठाया गया....। बिचोलियों ने बहती गंगा में हाथ धो लेने की शैली में... बीच में ही अनाज गायब कर दिया है....। तंत्र ने न मालूम कौन सा मंत्र... रट रखा है कि... उस को संकट के समय भी.... मानवता की कराह सुनाई नहीं देती....। ऐसे गरीबों के बच्चे भूख लगने पर.. बिलखते हैं.... और उनके माँ बाप आँसू पीकर रह जाते हैं...। मजदूरों की पैदल यात्रा... लॉक डाउन के पहले हिस्से से जारी है... किसी को उनकी चिंता लॉक डाउन टू के आखिर में हुई है....लेकिन तब तक...कितने लोग..सड़कों पर घर पहुंचने की तमन्ना में...जिंदगी से हाथ धो बैठे हैं...। इनमें से कुछ भूख से मे गयें हो तो आश्चर्य नहीं.....। उनके परिजन आस लगाए हैं... उनके आने की...? वो किससे फरियाद करें... कौन सुनेगा.. उनकी पुकार...। वो जो अमीरो पर रहम करने में मशगूल हैं... या वो तंत्र जो... गरीबों पर सितम ढहाने... का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहता...।
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