इलेक्ट्रॉनिक मीडिया : संभल सको तो संभलो
शैलेश तिवारी
मीडिया... एक ऐसा शब्द जो लोकतंत्र के प्रहरी का पर्याय माना जाता है....। जनमानस के भरोसे का नाम भी..... मीडिया है...। .. मिशन से शुरू हुआ मीडिया... पहले प्रोफेशन.. और अब टोडिसियम् (चाटुकारिता, कदमबोसी) के दौर में प्रवेश कर चुका है...। कभी प्रिंट तक सीमित रहने वाले मीडिया का...... पहले इलेक्ट्रॉनिककरण हुआ..... फिर सोशल मीडिया ने पैठ बनाई.....और अब बेव मीडिया का दौर आ चुका है...। बदलाव की बयार ने.... विश्वास के बाग में पतझड़ ला दिया... सबसे ज्यादा विश्वास खोया... इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने....।
मुझे नहीं मालूम किस कार्टूनिस्ट ने ये कार्टून बनाया है... लेकिन जिसने भी बनाया है... एक चित्र में पूरा उपन्यास लिख दिया है..। जिस पर खूब कहा जा सकता है...। कामना की पूर्ति के लिए जब कर्म की आहुति दी जाने लगती है.... तब कार्टूनिस्ट की तूलिका... की कोख से ऐसा कार्टून जन्म लेता है....। गौर से देखिये इस कार्टून को.... जो चीख चीख कर कह रहा है... गंदगी परोसने के बात.... अपने दर्शक के दिमाग में गंदगी भर देने की बात.....।... अब तो समझने की जरूरत है....। कार्टून के संदेश को सुने जाने का वक्त है...। सवाल उठता है ऐसा क्यों किया जाए.... तो सुन लिजिए साहब.... आज जब पूरी दुनिया के साथ हमारा देश भारत भी..... संकट से जूझ रहा है.... चहुँ ओर मानवीयता कराहती हुई पुकार लगा रही है... तो फर्ज है सभी का एकजुट होकर तूफान से मुकाबला करने का... ना कि बिखर कर... कमजोर हो जाने का..। यह अधिकांश चैनल क्या कर रहे हैं....।
नफरत की सलाईयों पर.... सामाजिक अलगाव के ऊन से..... छदम राष्ट्र प्रेम का स्वेटर बुन रहे हैं....। देश को बाँटने पर आमादा हैं....। सरकार अरुणाचल प्रदेश की हो... उत्तर प्रदेश की हो... या कर्नाटक की... अथवा केंद्र की.... सभी ने कुछ चैनल को चेतावनी सी दी...। लेकिन कार्यवाही होना बाकी है....। इसी तरह की और भी वजह हैं जिनके चलते ये अधिकांश चैनल अपना न केवल विश्वास खो रहे हैं... बल्कि ... दंडवत हो जाने की प्रक्रिया को कई कई बार दोहरा कर... अपने अस्तित्व पर संकट को भी बुलावा दे रहे हैं...।
एक सवाल ये भी आ सकता है कि इन चैनल के द्वारा ऐसा किया क्यों जा रहा है.. ?
जवाब आता है.... पद, प्रतिष्ठा और पैसा... ये हैं वो कामना... जिनके चलते कर्म से दूर हो गए ये अधिकांश चैनल.....।
संसद के गलियारों में चैनल मालिकों की सांसद बनकर चहल कदमी करने की कामना.... बयाँ
कर देती है पूरी दास्ताँ.... पद पाने की.... जिसके जरिए.. प्रतिष्ठा भी मिल ही जाती है...। छः साल पहले के डेढ़ हजार करोड़ के विज्ञापन का.... बजट... अब दस हजार करोड़ रूपये से ज्यादा का आंकडा क्रॉस कर चुका है... जो कहता है कहानी पैसा बटोरने की कामना की...। यही से कर्म से दूरी बनती है... मीडिया का कर्म है जनता की आवाज बनना... लेकिन कामना ने उसको सरकारी भोंपू बना कर रख दिया है....। फैला रहे हैं नफरत जैसी कई तरह की गंदगी..... जो दर्शक के दिमाग में जमा हो रही है... जब इसका ओवर फ्लो होगा... तब देश को किन परिस्थिति का सामना करना होगा.. ? वो दौर कितनी कठिन परीक्षा का होगा....? सोचकर किसी भी नागरिक का कलेजा काँप उठना... सामान्य बात है....। ये तमाम कहानियाँ.... ये किसी अनजान कार्टूनिस्ट पत्रकार का कार्टून कह रहा है....। यह चेताते हुए... कि.... संभल सको तो संभलो....।


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