लेखिका
दहलीज लांघ कर स्त्री
जब पकड़ने चलती है स्वालंबन के चाँद को,
तो वह अकेले नहीं होती
साथ ले चलती है अनगिनत चिंताएँ।
करने लगती है इंतजाम उन सभी चिंताओं का।
सुबह की चाय से लेकर रात के खाने की
बाबू की दवा से लेकर अम्मा के चश्मे का।
चलते हुए कदमों में
शामिल होती है एक बेबसी भी
जो उसकी छातियों से जम जाती है
और नजर आती है वह मासूम आँखें
जिनमें छलकती दिखती हैं कुछ बूंदें
आँसुओं की और एक मद्धिम आवाज।
इन आवाजों को सीने से लगाए
वह चलती रहती है।
डेस्कटॉप पर निगाहें टिकी है लेकिन
दिल वहाँ अटका हुआ होता है जहाँ पर
छोड आती है उस मासूम चेहरे को।
हाथों को चलाते दिमाग कहीं और अटकाए
कर रही है साफ फिसलन भरे फर्श पर
निराशाओं का जमा पानी।
सफलता के लिए कर रही हैं समझौते
अपनी नींद और भूख से भी
यह भूख बेतरतीबी से बिखरी जिंदगी में
खोए प्यार को पाने की भी है।
उस चाँद को पकड़ने के लिए
पार करने होंगे अनगिनत सूरज
जो तपा रहे है उसकी रूह को
जला कर उसके ख्वाबों को।
इन सूरज के साथ एक आकाश गंगा भी है
असंख्य रिश्तों को लपेटे हुए।
इन रिश्तों को वह सहेज लेती है दामन में
और बांध लेती है एक पोटली।
चेहरे पर एक मुस्कान लाने के लिए
ओढ़ लेती है कुछ सौंदर्य प्रसाधन
ताकि उसकी खिलखिलाहट में
झलके आत्मविश्वास।
यकीन मानिए वह इन सफलताओं में
भी ढूंढती है अपनी उन चिंताओं को
जो शामिल है जिसकी जिंदगी में।
संपादक
वह आगे बढ़ती औरत
दहलीज लांघ कर स्त्री
जब पकड़ने चलती है स्वालंबन के चाँद को,
तो वह अकेले नहीं होती
साथ ले चलती है अनगिनत चिंताएँ।
करने लगती है इंतजाम उन सभी चिंताओं का।
सुबह की चाय से लेकर रात के खाने की
बाबू की दवा से लेकर अम्मा के चश्मे का।
चलते हुए कदमों में
शामिल होती है एक बेबसी भी
जो उसकी छातियों से जम जाती है
और नजर आती है वह मासूम आँखें
जिनमें छलकती दिखती हैं कुछ बूंदें
आँसुओं की और एक मद्धिम आवाज।
इन आवाजों को सीने से लगाए
वह चलती रहती है।
डेस्कटॉप पर निगाहें टिकी है लेकिन
दिल वहाँ अटका हुआ होता है जहाँ पर
छोड आती है उस मासूम चेहरे को।
हाथों को चलाते दिमाग कहीं और अटकाए
कर रही है साफ फिसलन भरे फर्श पर
निराशाओं का जमा पानी।
सफलता के लिए कर रही हैं समझौते
अपनी नींद और भूख से भी
यह भूख बेतरतीबी से बिखरी जिंदगी में
खोए प्यार को पाने की भी है।
उस चाँद को पकड़ने के लिए
पार करने होंगे अनगिनत सूरज
जो तपा रहे है उसकी रूह को
जला कर उसके ख्वाबों को।
इन सूरज के साथ एक आकाश गंगा भी है
असंख्य रिश्तों को लपेटे हुए।
इन रिश्तों को वह सहेज लेती है दामन में
और बांध लेती है एक पोटली।
चेहरे पर एक मुस्कान लाने के लिए
ओढ़ लेती है कुछ सौंदर्य प्रसाधन
ताकि उसकी खिलखिलाहट में
झलके आत्मविश्वास।
यकीन मानिए वह इन सफलताओं में
भी ढूंढती है अपनी उन चिंताओं को
जो शामिल है जिसकी जिंदगी में।
दिव्या राकेश शर्मा।
--------------------परिचय
दिव्या राकेश शर्मा, गुड़गाँव हरियाणा निवासी हैं। साहित्य की विभिन्न विधाओं में आपकी लेखनी सतत् सेवारत है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में आपकी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं। एक बाल कथा और एक बाल कविता पाठ्यक्रम के लिए भी चयनित हुई हैं। आपकी लघु कथाओं पर आधारित नुक्कड़ नाटकों का मंचन नाट्य कलाकारों द्वारा एक सीरीज के रूप में किया गया है। विभिन्न मंचों से आप सम्मानित भी हो चुकी है। एम पी मीडिया पॉइंट पर आपका स्वागत है।संपादक


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