लेखिका
संतुलन प्रकृति का.... कहता हो जाओ सावधान
प्रकृति अपना संतुलन खुद बना लेती है. कितने संकेत दिए उसने, ग्लोबल वॉर्मिंग, पानी की कमी, सुनामी, भूकम्पों द्वारा कि रुक जाओ , संभल जाओ, वर्ना सब ख़त्म हो जायेगा.
पर नहीं … हम मनु की संताने अपने आप को किसी ईश्वर से कम नहीं समझतीं. हम हर समस्या का हल निकाल लेंगे. दिमाग पाया है हमने ऐसा.
कितना ज्यादा हो गया था न… बाहर खाना, बाहर जाना, बिना बात की खरीदारी, अति का मनोरंजन. लोगों ने घरों में पकाना खाना ही बंद कर दिया. मॉल, होटल, रेस्तौरेंट्स, सिनेमा बस बनते गए… बनते गए. मिलने- जुलने, खाने – बतियाने की जगह घरों से निकल कर बार, पब और माल्स ने ले लीं. हमने धरती को कंक्रीट का जंगल बना डाला, हर प्राकृतिक साधन को कैमिकल में बदल डाला और अपने शरीर को कचरे का डिब्बा बना डाला.
तो जब प्रकृति के सारे संकेत फ़ैल हो गए तो डाला उसने अपना आखिरी दाव – ऐसा हथियार जिससे बचाव और जिसका इलाज ही वही था, जिसे हम भूल चुके थे या हमने पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया था – यानि – घर में रहना, स्वच्छता रखना, सादा खाना, प्रकृति का ख्याल और ईश्वर की नेमत इस शरीर की देखभाल.
तो बस … कोरोना और कुछ नहीं प्रकृति का तरीका है मनुष्य को मनुष्यता समझाने का, फिर से अपनी जड़ों तक ले जाने का. समझ जाएँ हम अभी तो अच्छा है… वरना अपनी सुरक्षा के लिए प्रकृति के पास हथियार, दाव और भी होंगे…
तो संभल जाओ – थम जाओ
शिखा वार्ष्णेय , लंदन, इंग्लेंड
--------------परिचय
अपने बारे में कुछ कहना कुछ लोगों के लिए बहुत आसान होता है, तो कुछ के लिए बहुत ही मुश्किल और मेरे जैसों के लिए तो नामुमकिन फिर भी अब यहाँ कुछ न कुछ तो लिखना ही पड़ेगा न. तो सुनिए. मैं एक जर्नलिस्ट हूँ मास्को स्टेट यूनिवर्सिटी से गोल्ड मैडल के साथ टीवी जर्नलिज्म में मास्टर्स करने के बाद कुछ समय एक टीवी चैनल में न्यूज़ प्रोड्यूसर के तौर पर काम किया, हिंदी भाषा के साथ ही अंग्रेज़ी,और रूसी भाषा पर भी समान अधिकार है परन्तु खास लगाव अपनी मातृभाषा से ही है.अब लन्दन में निवास है और लिखने का जुनून है।


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