लेखिका
जिनका काँव-काँव करना
चुभता था कानों को...
आज अपनी
छत की मुंडेर पर,
बैठा जो देखा मैंने
जाने क्यों बतियाने लगी?
आज से
पितरों के दिन शुरू हैं,
शायद...
शायद ढूँढ रही मैं भी
उस कौवे में किसी अपने को,
बहुत देर तक करता रहा
वो काँव-काँव...
और
और मुझे आज
बिल्कुल भी चुभ नहीं रहा था
उनका यूँ शोर मचाना,
मुझे फिक्र हो रही थी
कहीं उसका कंठ
सूख तो नहीं गया होगा...
कहीं उसे भूख तो
नहीं लगी होगी...
मैं ले आई
कुल्हड़ में पानी
और रख दिया उसके समीप,
पर उसने
छुआ भी नहीं उसे...
जैसे कह रहा हो
गुड़िया!
आज भी मैं
नहीं पी सकता
तुम्हारे घर का पानी,
मैं आज भी
सिर्फ तुम्हें देखने आया हूँ,
गुड़िया!
आँसू से नहीं
मुस्कराहट से मुझे विदा करना...
साहित्य सेवा के धर्म को आप निभाती रही हैं। एकल काव्य संग्रह 'तुम रहोगे न मुझमें' तथा साझा संकलन 'कविता अभिराम' व 'अनुभूतियाँ प्रेम प्रकाशित हो चुकी हैं।
सम्मान एवं पुरुस्कार भी प्राप्त हुए हैं। आपका एम पी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है।
संपादक
वो जो कौवे
मुझे बिल्कुल पसंद नहीं थेजिनका काँव-काँव करना
चुभता था कानों को...
आज अपनी
छत की मुंडेर पर,
बैठा जो देखा मैंने
जाने क्यों बतियाने लगी?
आज से
पितरों के दिन शुरू हैं,
शायद...
शायद ढूँढ रही मैं भी
उस कौवे में किसी अपने को,
बहुत देर तक करता रहा
वो काँव-काँव...
और
और मुझे आज
बिल्कुल भी चुभ नहीं रहा था
उनका यूँ शोर मचाना,
मुझे फिक्र हो रही थी
कहीं उसका कंठ
सूख तो नहीं गया होगा...
कहीं उसे भूख तो
नहीं लगी होगी...
मैं ले आई
कुल्हड़ में पानी
और रख दिया उसके समीप,
पर उसने
छुआ भी नहीं उसे...
जैसे कह रहा हो
गुड़िया!
आज भी मैं
नहीं पी सकता
तुम्हारे घर का पानी,
मैं आज भी
सिर्फ तुम्हें देखने आया हूँ,
गुड़िया!
आँसू से नहीं
मुस्कराहट से मुझे विदा करना...
शिल्पी अग्रवाल, सुलतानपुर (उप्र)
--------------------परिचय
शिल्पी अग्रवाल दरियापुर सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश की निवासी हैं।साहित्य सेवा के धर्म को आप निभाती रही हैं। एकल काव्य संग्रह 'तुम रहोगे न मुझमें' तथा साझा संकलन 'कविता अभिराम' व 'अनुभूतियाँ प्रेम प्रकाशित हो चुकी हैं।
सम्मान एवं पुरुस्कार भी प्राप्त हुए हैं। आपका एम पी मीडिया पॉइंट पर स्वागत है।
संपादक


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