लेखक
......" ये राजनैतिक मुद्दे और देश की आवाम। कई बार कुछ मुद्दे बनाए जाते हैं। जिससे राजनीति गर्म हो और देश के लोग क्षेत्र, जात, धर्म, भाषा, रंग या किसी भी बेतुकी बात पर बट जाएं। ऐसे मुद्दे आए दिन खड़े किए जाते हैं। ऐसे ही एक मुद्दे पर देश का माहोल इन दिनों बिगड़ा हुआ है। कई बार तो मुद्दे वाकई में सच्चे होते हैं। जो गलत हों तो कुछ लोग विरोध करते हैं, लेकिन उन मुद्दों के समर्थन में भी लोग सड़कों पर उतर जाते हैं। जिससे लोगों के बीच अपने आप दूरियां बढ़ जाती हैं। जो देश के लिए घातक हैं।"
....कॉलेज की वाद-विवाद प्रतियोगिता में अमित ने अपना पक्ष पुरजोर तरीके से रखा।
अब बारी आई असीम की, जो अमित का दोस्त है, उसने अपना पक्ष रखते हुए कहा....
" देश में बहुसंख्यक अब अल्पसंख्यकों को दबाने का प्रयास कर रहे हैं। सरकार और देश की तमाम बड़ी शक्तियां मिलकर दबे कुचले और अल्प संख्यों के अधिकार छीनना चाहती हैं। देश में इस तरह के हालात राजनैतिक फायदे के लिए बनाए जा रहे हैं। इससे बहुसंख्यकों को फायदा होना है इसके चलते वे इस सब में शामिल हैं। जिसका विरोध किया जाना जरूरी है। इस सब में आखिर में नुकसान तो कुछ वर्गों का ही होना है। कुछ लोग और वर्ग विशेष के लोग अपना वर्चसव स्थापित करना चाहते हैं। "
दोनों ने अपने-अपने पक्ष रखे। वाद-विवाद प्रतियोगिता अब विवाद प्रतियोगिता में बदलने लगी थी। प्रतियोगिता का विषय था। सांप्रदायिकता और राजनीति, लेकिन अब बात हो रही थी हिंदू और मुस्ल्मि की। प्रतियोगिता में समय सीमा निर्धारित थी। दोनों प्रतिभागियों काे पहले पांच-पांच मिनट, इसके बाद दूसरे राउंड में तीन-तीन मिनट और अंत में दो-दो मिनट बोलना था। इससे प्रतिभागियों के आपा खोने से पहले ही सायरन बज जाता था। प्रतियोगिता तो खत्म हो गई, लेकिन यह विवाद अमित और असीम के बीच स्कूल के बाद तक चलता रहा। दोनों जिगरी दोस्त हैं, लेकिन आज से दोस्ती खत्म होने को थी। अमित कहता सरकार कुछ भी करे तुम लोगों को दिक्कत होती है। असीम ने कहा यदि सरकार गलत करेगी तो विरोध भी न करें। असीम ने गुस्से में कहा ये हिन्दुस्तान किसी के बाप का है क्या। अमित को भी ताव आ गया। किसी का भी हो तुम्हारा तो नहीं है। दोनों की तू-तू मैं-मैं कुछ देर हाथापाई में बदलने वाली थी। जिसका अंदाजा पहले से विवेक को था। विवेक भी अमित और असीम की क्लास में ही था और उसकी भी दोनों से बहुत पटती थी। उसने मामले को संभालने के बाद कहा चलों छोड़ों ये सब। टपरी पर चाय पीने चलते हैं। दोनों तैयार नहीं थे पर विवेक ने दोनों को मना लिया।
टपरी शहर की चाय की चर्चित दुकान थी। जो शहर के बाहर थी। शहर के एक कोने पर कॉलेज था और दूसरे कौने से शहर के बाहर निकल कर चाय टपरी पर जाना होता था। अमित और असीम दोनों एक साथ असीम की बाइक से कॉलेज आते थे, लेकिन हाल ही में हुई बहस के बाद दोनों एक बाइक पर बैठना नहीं चाहते थे। असीम ने अपनी गाड़ी स्टार्ट की और अमित को बैठने को नहीं कहा और अमित का मन भी उसके साथ बैठने का नहीं था। वह विवेक की बाइक पर बैठ गया। तीनों दो बाइक से शहर के बाजार से निकल रहे थे। इस बीच विवेक दोनों को समझा रहा था।
उसने कहा कुछ लोग कहते हैं वो मुसलमान हैं। कुछ कहते हैं वे हिन्दू हैं। एक हिंदू और एक मुसलमान के बीच फर्क क्या है। न खून का न हड्डी का ना आत्मा का। फिर क्या अंतर है। दोनों कुछ नहीं बोले दूसरी बाइक चला रहे असीम की तरफ देख कर विवेक ने कहा विचारों का। कुछ विचार तुमने पकड़ लिए हैं। कुछ हमने। इस पर असीम ने कहा ये मजहब की बात कहां हैं। ये तो रातनीति की बात है, मुद्दों की बात है। विवेक ने कहा राजनीति, धर्म, जाति सबकी एक अवधारणा है। जिससे वो प्रेरित हैं। जो दीवार की तरह लोगों के बीच खड़ी है। ये विवाद इतने बढ़ जाते हैं कि जब तक लोग एक दूसरे की हत्या न कर दें उन्हें चैन नहीं मिलता। लोग मर जाएं पर ये विचार नहीं मरने चाहिए। क्या विचार इतने जरूरी हैं और हां एक बात और इसके कारण नेक विचार नहीं पनप पाते। अपनी सुध में बतियाते चल रहे। विवेक से असीम ने कहा भाई समाने देख। विवेक ने घबराकर ब्रेक लगाया। टायर के सड़क पर घिसने की आवाज आई। सड़क पर एक काली लाइन खिंच गई। विवेक और अमित घबरा गए। एक बुजुर्ग सड़क पर पड़ी किसी चीज को पैर से आगे पीछे कर रहे थे। बुजुर्ग के कंधे पर एक भारी झोला टंगा था। इस सब से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा। विवेक को बहुत गुस्सा आया, लेकिन उसे लगा बाबा की कोई चीज गिर गई है। जिसे वो उठा रहे हैं। ध्यान से देखने पर पता चला वहां एक टूटी चप्पल पड़ी थी। यह देख तीनों को गुस्सा आया और तीनों गाड़ी से उतरे बाबा के पास गए और बाेले। आपको मरना है क्या? बाबा ने कुछ कहा नहीं ...मुस्कुराए और अपना झोला अमित को थमा दिया। अमित ने झोला पकड़ा और गुस्से में कहा - हम आपसे कुछ पूछ रहे हैं और आप झोला दे रहे हैं। बाबा कुछ नहीं बोले करहाते हुए झुके और सड़क पर पड़ी उल्टी चप्पल को सीधा किया। इस पर विवेक ने कहा अजीब हो। चप्पल को सीधा करने आप दो-चार को मार दो। इस पर बाबा ने कहा बेटा यदि चप्पल उल्टी हो तो कलह होती है और झगड़े होते हैं। इस पर असीम ने कहा यहां कौन सा अापका घर है जो बहू-बेटे झगड़ लेंगे। बाबा मुस्कुराए और बोले ये देश और शहर तो मेरा है। यहां कलह तो हो ही रही और लोग झगड़ने पर उतारू हैं। है तो ये अंध विश्वास पर मेरा विचार है झगड़ा न हो इसलिए उल्टी चप्पल सीधी कर रहा था, आपको कोई दिक्कत हुई हो तो माफ करना। अमित के हाथ से बाबा ने झोला लिया और आगे बढ़ गए। तीनों सन्न रह गए। उनके मन में विचार चल रहा था कि एक विचार यह भी है। तीनों बाइक की तरफ मुड़े। विवेक और असीम ने बाइक स्टार्ट की। अमित असमंजस में था कि किसी बाइक पर बैठे। असीम ने अमित की तरफ देखकर पलके झपकाई। अमित, असीम की बाइक पर बैठ गया।
दिल का हाल कहे दिलवाला
सीधी सी बात न मिर्च मसाला...
बहुत ही गज़ब की कल्पना शक्ति का उपयोग कर मौजूदा वक्त की.... जरूरत वाली कहानी रची है.... आकाश भाई.... बधाई तो बनती है...।
शैलेश तिवारी, संपादक
उल्टी चप्पल
......" ये राजनैतिक मुद्दे और देश की आवाम। कई बार कुछ मुद्दे बनाए जाते हैं। जिससे राजनीति गर्म हो और देश के लोग क्षेत्र, जात, धर्म, भाषा, रंग या किसी भी बेतुकी बात पर बट जाएं। ऐसे मुद्दे आए दिन खड़े किए जाते हैं। ऐसे ही एक मुद्दे पर देश का माहोल इन दिनों बिगड़ा हुआ है। कई बार तो मुद्दे वाकई में सच्चे होते हैं। जो गलत हों तो कुछ लोग विरोध करते हैं, लेकिन उन मुद्दों के समर्थन में भी लोग सड़कों पर उतर जाते हैं। जिससे लोगों के बीच अपने आप दूरियां बढ़ जाती हैं। जो देश के लिए घातक हैं।"
....कॉलेज की वाद-विवाद प्रतियोगिता में अमित ने अपना पक्ष पुरजोर तरीके से रखा।
अब बारी आई असीम की, जो अमित का दोस्त है, उसने अपना पक्ष रखते हुए कहा....
" देश में बहुसंख्यक अब अल्पसंख्यकों को दबाने का प्रयास कर रहे हैं। सरकार और देश की तमाम बड़ी शक्तियां मिलकर दबे कुचले और अल्प संख्यों के अधिकार छीनना चाहती हैं। देश में इस तरह के हालात राजनैतिक फायदे के लिए बनाए जा रहे हैं। इससे बहुसंख्यकों को फायदा होना है इसके चलते वे इस सब में शामिल हैं। जिसका विरोध किया जाना जरूरी है। इस सब में आखिर में नुकसान तो कुछ वर्गों का ही होना है। कुछ लोग और वर्ग विशेष के लोग अपना वर्चसव स्थापित करना चाहते हैं। "
दोनों ने अपने-अपने पक्ष रखे। वाद-विवाद प्रतियोगिता अब विवाद प्रतियोगिता में बदलने लगी थी। प्रतियोगिता का विषय था। सांप्रदायिकता और राजनीति, लेकिन अब बात हो रही थी हिंदू और मुस्ल्मि की। प्रतियोगिता में समय सीमा निर्धारित थी। दोनों प्रतिभागियों काे पहले पांच-पांच मिनट, इसके बाद दूसरे राउंड में तीन-तीन मिनट और अंत में दो-दो मिनट बोलना था। इससे प्रतिभागियों के आपा खोने से पहले ही सायरन बज जाता था। प्रतियोगिता तो खत्म हो गई, लेकिन यह विवाद अमित और असीम के बीच स्कूल के बाद तक चलता रहा। दोनों जिगरी दोस्त हैं, लेकिन आज से दोस्ती खत्म होने को थी। अमित कहता सरकार कुछ भी करे तुम लोगों को दिक्कत होती है। असीम ने कहा यदि सरकार गलत करेगी तो विरोध भी न करें। असीम ने गुस्से में कहा ये हिन्दुस्तान किसी के बाप का है क्या। अमित को भी ताव आ गया। किसी का भी हो तुम्हारा तो नहीं है। दोनों की तू-तू मैं-मैं कुछ देर हाथापाई में बदलने वाली थी। जिसका अंदाजा पहले से विवेक को था। विवेक भी अमित और असीम की क्लास में ही था और उसकी भी दोनों से बहुत पटती थी। उसने मामले को संभालने के बाद कहा चलों छोड़ों ये सब। टपरी पर चाय पीने चलते हैं। दोनों तैयार नहीं थे पर विवेक ने दोनों को मना लिया।
टपरी शहर की चाय की चर्चित दुकान थी। जो शहर के बाहर थी। शहर के एक कोने पर कॉलेज था और दूसरे कौने से शहर के बाहर निकल कर चाय टपरी पर जाना होता था। अमित और असीम दोनों एक साथ असीम की बाइक से कॉलेज आते थे, लेकिन हाल ही में हुई बहस के बाद दोनों एक बाइक पर बैठना नहीं चाहते थे। असीम ने अपनी गाड़ी स्टार्ट की और अमित को बैठने को नहीं कहा और अमित का मन भी उसके साथ बैठने का नहीं था। वह विवेक की बाइक पर बैठ गया। तीनों दो बाइक से शहर के बाजार से निकल रहे थे। इस बीच विवेक दोनों को समझा रहा था।
उसने कहा कुछ लोग कहते हैं वो मुसलमान हैं। कुछ कहते हैं वे हिन्दू हैं। एक हिंदू और एक मुसलमान के बीच फर्क क्या है। न खून का न हड्डी का ना आत्मा का। फिर क्या अंतर है। दोनों कुछ नहीं बोले दूसरी बाइक चला रहे असीम की तरफ देख कर विवेक ने कहा विचारों का। कुछ विचार तुमने पकड़ लिए हैं। कुछ हमने। इस पर असीम ने कहा ये मजहब की बात कहां हैं। ये तो रातनीति की बात है, मुद्दों की बात है। विवेक ने कहा राजनीति, धर्म, जाति सबकी एक अवधारणा है। जिससे वो प्रेरित हैं। जो दीवार की तरह लोगों के बीच खड़ी है। ये विवाद इतने बढ़ जाते हैं कि जब तक लोग एक दूसरे की हत्या न कर दें उन्हें चैन नहीं मिलता। लोग मर जाएं पर ये विचार नहीं मरने चाहिए। क्या विचार इतने जरूरी हैं और हां एक बात और इसके कारण नेक विचार नहीं पनप पाते। अपनी सुध में बतियाते चल रहे। विवेक से असीम ने कहा भाई समाने देख। विवेक ने घबराकर ब्रेक लगाया। टायर के सड़क पर घिसने की आवाज आई। सड़क पर एक काली लाइन खिंच गई। विवेक और अमित घबरा गए। एक बुजुर्ग सड़क पर पड़ी किसी चीज को पैर से आगे पीछे कर रहे थे। बुजुर्ग के कंधे पर एक भारी झोला टंगा था। इस सब से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा। विवेक को बहुत गुस्सा आया, लेकिन उसे लगा बाबा की कोई चीज गिर गई है। जिसे वो उठा रहे हैं। ध्यान से देखने पर पता चला वहां एक टूटी चप्पल पड़ी थी। यह देख तीनों को गुस्सा आया और तीनों गाड़ी से उतरे बाबा के पास गए और बाेले। आपको मरना है क्या? बाबा ने कुछ कहा नहीं ...मुस्कुराए और अपना झोला अमित को थमा दिया। अमित ने झोला पकड़ा और गुस्से में कहा - हम आपसे कुछ पूछ रहे हैं और आप झोला दे रहे हैं। बाबा कुछ नहीं बोले करहाते हुए झुके और सड़क पर पड़ी उल्टी चप्पल को सीधा किया। इस पर विवेक ने कहा अजीब हो। चप्पल को सीधा करने आप दो-चार को मार दो। इस पर बाबा ने कहा बेटा यदि चप्पल उल्टी हो तो कलह होती है और झगड़े होते हैं। इस पर असीम ने कहा यहां कौन सा अापका घर है जो बहू-बेटे झगड़ लेंगे। बाबा मुस्कुराए और बोले ये देश और शहर तो मेरा है। यहां कलह तो हो ही रही और लोग झगड़ने पर उतारू हैं। है तो ये अंध विश्वास पर मेरा विचार है झगड़ा न हो इसलिए उल्टी चप्पल सीधी कर रहा था, आपको कोई दिक्कत हुई हो तो माफ करना। अमित के हाथ से बाबा ने झोला लिया और आगे बढ़ गए। तीनों सन्न रह गए। उनके मन में विचार चल रहा था कि एक विचार यह भी है। तीनों बाइक की तरफ मुड़े। विवेक और असीम ने बाइक स्टार्ट की। अमित असमंजस में था कि किसी बाइक पर बैठे। असीम ने अमित की तरफ देखकर पलके झपकाई। अमित, असीम की बाइक पर बैठ गया।
आकाश माथुर, सीहोर मप्र
------------------------------समीक्षा
युवा पत्रकार जो कुछ घटना क्रम देखता है.... उसके आधार पर समाचार का सृजन होता है... लेकिन बहुत कुछ ऐसा होता है जो समाचार पत्र के नियम कायदों की वजह से.. समाचार में स्थान नहीं पा पाता है... जबकि वह उल्लेखित और रेखांकित दोनों के योग्य होता है.... उसी टीस को, उसी दर्द को वह लेखक बनकर जब अपनी कहानी में उतारता है... तब वह एक ऐसा दस्तावेज बन जाता है... जो राष्ट्र की एकता और अखंडता दोनों को मजबूती देने का... अनुकरणीय प्रयास साबित होता है.....। ऐसे ही मन के दर्द को.. युवा पत्रकार और कहानीकार आकाश माथुर की कलम ने... शब्दों देकर... राष्ट्रवाद के भाव से सींचा है....। कॉलेज की जिस प्रतियोगिता का उद्देश्य... देश में बढ़ रही सामाजिक और धार्मिक खाई को पाटना रहा होगा.... वही प्रतियोगिता उसी मुद्दे पर... दोस्ती में दरार पैदा कर देती है....। कहना न होगा कि इसके पीछे के राजनैतिक कारणों का जिक्र भी कथाकार ने....पूरे साहस के साथ किया है.....। इन बिंदुओं का उल्लेख तो कथानक में है... लेकिन एक अनसुनी कराह भी इस कथानक में सुनाई देती है.... जो संविधान को खारिज करने से उभरी हुई है... या फिर उन नियमों के ताक में रख दिए जाने का परिणाम है.... जो सांप्रदायिकता के आधार पर राजनैतिक लाभ लेने को प्रतिबंधित करते हैं.... या ऐसे विषय के सार्वजनिक प्रचार प्रसार पर रोक लगाते हैं.....। आज यह सब राजनेताओ के मुख से और मुख्य धारा के मीडिया दोनों से प्रचारित और प्रसारित धड़ल्ले से हो रहा है... कोई रोकने वाला नहीं... हर समस्या में इस मुद्दे को ही जड़ बता कर... राजनैतिक दल अपनी सत्ता स्थापित कर रहे हैं...। यह वह अनकही बात है जो कथाकार ने... बहुत सलीके से कह दी है.... एक अंध विश्वास से.... दोस्ती का वह विश्वास जगा दिया... जिसकी जरूरत असीम और अमित के साथ साथ..... आज देश के हर नौजवान को है कि.... आंतरिक कलह से बचकर ही... उन्नति के पथ पर कंधे से कंधा मिलाकर ही बढ़ा जा सकता है..... गृह युद्ध की स्थिति में.... बाहरी शत्रु की ताकत अपने आप बढ़ जाती है.... काश ऐसा कोई बाबा देश को भी मिल जाए.... जिसके सामने आने पर... नफरत की बाइक के टायर सड़कों पर चीखते हुए थम जाएं..... उल्टी चप्पल सीधी हो जाए.... और असीम एवं अमित फिर से एक ही बाइक पर बैठ कर... एकता का तराना गुनगुनाने लगें.... लेकिन इसके लिए विवेक का होना आवश्यक है.... कहानी के तीसरे दोस्त की तरह.... विवेक के पात्र का नाम चयन भी ऐसा लगता है... जैसे लेखक की कलम आगाह कर रही हो.... जाग्रत विवेक से काम लो.... तभी एकता की मिसाल कायम हो पायेगी.....। इस कहानी के लिए एक पुराने गाने की पंक्तियाँ बहुत मौन्जू लग रही हैं..दिल का हाल कहे दिलवाला
सीधी सी बात न मिर्च मसाला...
बहुत ही गज़ब की कल्पना शक्ति का उपयोग कर मौजूदा वक्त की.... जरूरत वाली कहानी रची है.... आकाश भाई.... बधाई तो बनती है...।
शैलेश तिवारी, संपादक


Post A Comment: